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जिनसे लिया चंदा उन्हें ही चुनाव में दी पटकनी

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बैरिया। पहले राजनीतिक लड़ाई सिद्धांतों, आदर्शो व विकास को लेकर चलती थी। प्रत्याशी आमने-सामने चुनाव लड़ते थे लेकिन उनमें आपसी सौहार्द की कोई कमी नहीं थी। उन दिनों की एक घटना को साझा करते हुए क्षेत्र के दुर्जनपुर निवासी डॉ नथुनी प्रसाद बताते हैं कि 1962 की सोशलिस्ट पार्टी से स्व. मैनेजर सिंह थे, जबकि लाल वीरेन्द्र विक्रम सिंह निर्दल से प्रत्याशी थे। मैनेजर सिंह की माली हालत ठीक नहीं थी। लाल वीरेन्द्र विक्रम सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ते हुए उन्होंने उन्हीं से चुनाव लड़ने का चंदा मांगा। लाल वीरेन्द्र विक्रम ने भी उन्हें निराश नहीं किया और उन्हें चंदा भी दिया।
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चुनाव के बाद परिणाम स्वर्गीय मैनेजर सिंह के हक में गया और वे विधायक निर्वाचित हो गए । वहीं लाल वीरेन्द्र विक्रम सिंह चुनाव हार गए। आज के परिवेश में परस्पर एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के बीच इस प्रकार चंदे का आदान-प्रदान कल्पना से भी परे है। जब तक सियासतदां भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं थसे जनप्रतिनिधि जनसेवक थे। पहले राजनीति का उद्देश्य जनसेवा था अब धन अर्जन बन गया है। तभी तो विरोध करने वाले को नेता अपना दुश्मन समझने लगे हैं।
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