बलिया। पूर्व नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मंत्री रामगोविंद चौधरी के निधन की खबर से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। गांवों से लेकर चट्टी-चौराहों तक लोग उनके सरल स्वभाव, सहज व्यवहार और मिलनसार व्यक्तित्व को याद करते नजर आए। लंबे समय तक उनके साथ रहे लोगों की आंखें नम थीं और हर जुबां पर उनसे जुड़ी पुरानी यादें थीं। उनके निधन को राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लिए ऐसी क्षति बताया जा रहा है, जिसकी भरपाई मुश्किल है।
रामगोविंद चौधरी का राजनीतिक जीवन करीब पांच दशक तक सक्रिय रहा। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर विधानसभा, मंत्री पद और नेता प्रतिपक्ष के दायित्व तक पहुंचा, लेकिन पद मिलने के बाद भी आम लोगों से उनका सहज रिश्ता बना रहा। राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद वह लोगों से मिलते, उनकी बातें सुनते और कार्यकर्ताओं व आमजन के सुख-दुख में सहभागी बनने का प्रयास करते थे। यही अपनापन उनके निधन के बाद लोगों की यादों में सबसे अधिक उभरकर सामने आ रहा है।
पांच दशक की सियासत में अलग पहचान
करीब पांच दशक के राजनीतिक सफर में रामगोविंद चौधरी ने प्रदेश की सियासत में अपनी अलग पहचान बनाई। टाउन महाविद्यालय के अध्यक्ष से लेकर जेपी आंदोलन में जिले की अगुवाई करने और 1975 में जेल जाने तक उनका संघर्षपूर्ण राजनीतिक सफर रहा। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के विश्वासपात्र के रूप में 1977 में विधानसभा पहुंचने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लंबे समय तक उनके साथ रहे रमाशंकर तिवारी के अनुसार जनता पार्टी के उदय से लेकर उसके टूटने, जनता दल के गठन और बाद में समाजवादी पार्टी के राजनीतिक सफर तक रामगोविंद चौधरी चंद्रशेखर के विश्वासपात्र बने रहे। राजनीति में जिले और प्रदेश में किसी की हैसियत या राजनीतिक उड़ान उनके मार्ग में बाधक नहीं बनी। उनकी राजनीति की एक खास विशेषता यह भी रही कि एक दल के नेता होने के बावजूद उन्होंने सर्वदलीय संबंधों को महत्व दिया। जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग और गुटबाजी से अलग रहकर राजनीति करने का उनका अंदाज लोगों को प्रभावित करता रहा। उनके साथियों के अनुसार वह अवसरवादिता से दूर और राजनीति में साफगोई के पक्षधर रहे।
कलाकारों से लेकर किसानों तक के बीच रही पकड़
रामगोविंद चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़ाव बनाए रखा। कलाकार, अधिवक्ता, किसान, शिक्षक, व्यापारी और दबे-कुचले तबके के लोग उनके संपर्क में रहे। अपने से छोटे लोगों को पुत्रवत स्नेह देना और अग्रजों का सम्मान करना उनके व्यक्तित्व की विशेषता रही। परिवार और निजी हितों से अधिक उन्होंने सार्वजनिक जीवन और लोगों के लिए काम करने को महत्व दिया। उनके जाने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक एक ही चर्चा है—एक ऐसा नेता, जिससे लोग अपने सुख-दुख की बात सहजता से कह सकते थे, अब सिर्फ यादों में रह गया है।