कटान से एनएच को बचाने के लिए बालू की बोरियों को एनएच पर डालने के लिए ले जाता मजदूर।
काश! विभाग बाढ़ आने से पहले चेता होता और बंधे को मजबूत बनाने पर जोर दिया होता तो हजारों की आबादी पानी में नहीं डूबती। लेकिन विभागीय और प्रशासनिक लापरवाही ने कुछ ही समय में सैकड़ों एकड़ फसल और घरों को तबाह कर दिया। बंधा टूटने के बाद तबाही का मंजर देख पीड़ितों का कलेजा फटा जा रहा था, उनकी चीख पुकार से द्वाबा क्षेत्र द्रवित हो रहा था। उन्हें बस यहीं चिंता सताए जा रही थी कि अब उनका क्या होगा, उनकी जिंदगी कैसे चलेगी।
बंधे के टूटने से उदई छपरा, प्रसाद छपरा, गोपालपुर, दूबे छपरा, आलम राय का टोला, पांडेयपुर, चिरंजी छपरा समेत करीब एक दर्जन गांव के लोगों में खलबली मच गया। अपने घरों और फसलों को आंखों के सामने डूबते देख ग्रामीणों के साथ ही वहां खड़े लोगों के आंखों से भी आंसू छलक रहे थे। वहां खड़े ग्रामीणों की दाद देनी होगी, जो प्रभावित परिवार की मदद के लिए आगे आए तथा उनका सामान सुरक्षित रखवाने से लेकर उन्हें पानी से बाहर निकालने में भी मदद करते रहे।
बंधे की स्थिति को देखते हुए आसपास के गांव वाले दूबे छपरा, गोपालपुर ग्राम सभा समेत अन्य गांवों में पहुंच गए तथा मानवता की मिसाल पेश करते हुए सहयोग में लगे रहे। इन गांव के लोगों ने पड़ोसी धर्म निभाया तथा कुछ पीड़ितों को अपने यहां भी शरण दिए।