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सातवीं पास छात्र को कक्षा तीन में मिला था प्रवेश, छह माह में ही कक्षा छह में प्रवेश के लिए किया मजबूर

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हल्दी। क्षेत्र के ओझवलिया निवासी ख्यातिलब्ध साहित्यकार पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड विद्वान नहीं ही नहीं बल्कि उदार प्रवृत्ति के थे। उनका दृष्टिकोण व्यापक था। 19 मई को उनकी जयंती पर गांव में आयोजित सादे समारोह में हिंदी साहित्य में उनके अभूतपूर्व योगदान को याद किया जाएगा। लॉक डाउन की वजह से स्मृति सभा में कम साहित्यकारों को बुलाया जाएगा।
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पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 मई 1907 को पं. अनमोल द्विवेदी की पत्नी ज्योतिष्मती देवी के गर्भ से हुआ। पहले इनका नाम व्योमकेश द्विवेदी का था। जन्म के समय ही इनके नाना को एक लंबी लड़ाई के बाद विजय स्वरूप एक हजार रुपये प्राप्त हुए थे जिसे उन्होंने नाती को दे दिया था। इस घटना के बाद व्योमकेश का नाम बदलकर हजारी प्रसाद हो गया। पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्राइमरी की शिक्षा ग्रामीण विद्यालय रेपुरा से हुई। मिडिल की परीक्षा बसरिकापुर से उत्तीर्ण करने के बाद वे चचेरे भाई विश्वनाथ द्विवेदी के साथ पिता के पास बंगाल गए। वहां फरीदपुर जिले में बरहमगंज स्थित एक निजी विद्यालय में दोनों भाइयों ने दाखिला लिया। विद्यालय का माध्यम बांग्ला भाषा थी। तब कक्षा सात उत्तीर्ण दोनों बालकों को बांग्ला का ज्ञान न होने के कारण कक्षा तीन में प्रवेश मिला। वहां पं. द्विवेदी (व्योमकेश) ने घोर परिश्रम कर बांग्ला भाषा का उत्तम ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद प्रधानाचार्य को मजबूर होकर इन्हें कक्षोन्नति कर कक्षा छह में प्रविष्टि देनी पड़ी। 1921 में महात्मा गांधी ने स्कूल छोड़ो आंदोलन छेड़ा तो विद्यालय बंद हो गया। दोनों भाई गांव आ गए। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए द्विवेदी जी ने 1921 में वाराणसी जाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष में प्रवेश लिया। 1929 में वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। इसके बाद जब वे मालवीय जी से आशीर्वाद लेने गए तो कहा कि तुम हिंदी के अच्छे विद्वान हो। रविन्द्रनाथ ठाकुर ने एक हिंदी अध्यापक मांगा है, पत्र लिख देता हूं, चले जाओ। इसके बाद पं.हजारी प्रसाद द्विवेदी गए और वहां से उनकी कीर्ति-पताका फहराने लगी। इसके बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उच्चकोटि के निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक, चिन्तक तथा शोधकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए।
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रचनाओं पर दिखती है व्यक्तित्व की छाप
पं. द्विवेदी का व्यक्तित्व उदार और दृष्टिकोण व्यापक है। उन्होंने सुर, तुलसी आदि पर जो आलोचनाएं लिखी हैं वे हिंदी में पहले नहीं लिखी गईं। उनका निबंध हिन्दी साहित्य की स्थायी निधि है। उनकी समस्त कृतियों पर उनके गहन विचारों और मौलिक चिंतन की छाप है। उनके निबंधों में दार्शनिक तत्वों की प्रधानता रहती है । हिंदी साहित्य का इतिहास, भारतीय धर्म साधना, सूरदास, कबीर आदि ग्रन्थ उनके साहित्य की परख और इतिहास बोध की प्रखरता को रेखांकित करते हैं। वाणभट्ट की आत्मकथा के साथ ही पुनर्नवा, चारूचन्द्रलेख, अनामदास का पोथा, जैसे ऐतिहासिक उपन्यास ऐतिहासिकता और पौराणिकता की रक्षा करते हैं।
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कई विश्वविद्यालयों को दी अपनी सेवा
पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी कई वर्षों तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपसभापति, खोज विभाग के निदेशक तथा नागरी प्रचारिणी सभा के संपादक रहे। 1950 में बीएचयू में हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर रहे। 1949 में लखनऊ विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की उपाधि प्रदान की थी। 1955 में वे प्रथम आफिशियल लैंग्वेज कमीशन के सदस्य चुने गए। उनको साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति ने 1957 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। 1958 में वे नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य रहे। 1960 में पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर होकर चंडीगढ़ चले गए। 1968 में ये फिर बीएचयू में डायरेक्टर नियुक्त हुए। इसके. बाद उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष हुए। 19 मई 1979 में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।
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गांव आज भी है उपेक्षित
द्विवेदी जी की रचनाओं से आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व आलोकित हो रहा है, लेकिन उनका पैतृक गांव ओझवलिया अपनी पहचान को मोहताज नजर आ रहा है। गांव में आज तक उनकी एक प्रतिमा तक नहीं स्थापित है। एक तालाब का नाम हजारी सरोवर जरूर रखा गया है, लेकिन उसके सौंदर्यीकरण के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया। इससे गांव के लोग काफी दुखी हैं।
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