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पुण्यतिथि पर विशेषः जानिए कैसे व्योमकेश बन गए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, इन्हीं के नाम पर पड़ा हिंदी का एक युग 

Mon, 18 May 2020 11:02 PM IST
विचित्र सिंह अमर उजाला नेटवर्क, बलिया
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हजारी प्रसाद द्विवेदी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
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पूर्वांचल के एक अत्यंत पिछड़े जिले से कक्षा सातवीं की परीक्षा देकर कोलकाता पहुंचे दो बालकों को सिर्फ इसलिए कक्षा तीन में प्रवेश दिया गया था कि उन्हें बंगला भाषा का ज्ञान नहीं था। लेकिन बालकों ने हार नहीं मानी। इसमें से व्योमकेश द्विवेदी की प्रतिभा को देखते हुए एक साल के अंदर ही वहां के प्रधानाचार्य को छठवीं कक्षा में भेजना पड़ा।
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यह बालक कोई और नहीं बलिया जिले के हल्दी थाना क्षेत्र के ओझवलिया गांव के आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी थे, जिन्होंने बाद में पूरे विश्व में हिंदी की पताका लहराई। ज्योतिष मर्मज्ञ पं. अनमोल द्विवेदी की पत्नी ज्योतिष्मती देवी के गर्भ से 19 अगस्त सन् 1907 ई. को व्योमकेश द्विवेदी का जन्म हुआ।

जन्म के समय ही इनके नाना को एक लंबी लड़ाई के बाद विजय स्वरूप एक हजार रुपये प्राप्त हुए। उन्होंने पूरे रुपये नाती को दे दिए। इस घटना के बाद व्योमकेश का नाम बदलकर हजारी प्रसाद हो गया। बाद में इन्हीं के नाम पर हिंदी का युग बना, जिसे हम द्विवेदी युग के नाम से जानते हैं।
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भारत-प्रसिद्ध हिंदी भाषा-भास्कर ज्योतिर्विद् आचार्य डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्राइमरी की शिक्षा-दीक्षा ग्रामीण विद्यालय रेपुरा से हुई। मिडिल की परीक्षा बसरिकापुर से उत्तीर्ण करने के बाद ये चचेरे भाई विश्वनाथ द्विवेदी के साथ पिता के पास तब के बंगाल गए। वहां फरीदपुर जिले में बरहमगंज स्थित एक निजी विद्यालय में दोनों भाईयों ने दाखिला लिया।

 

विद्यालय का माध्यम बांग्ला भाषा थी। तब कक्षा सात उत्तीर्ण दोनों बालकों को बांग्ला का ज्ञान न होने के कारण कक्षा तीन में प्रवेश मिला। वहां व्योमकेश ने घोर परिश्रम कर बांग्ला भाषा का उत्तम ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद प्रधानाचार्य को मजबूर होकर इन्हें कक्षा में उन्नति कर कक्षा छह में प्रविष्टि देनी पड़ी।

सन् 1921 में महात्मा गांधी ने स्कूल छोड़ो आंदोलन छेड़ा तो विद्यालय बंद हो गया। इसके बाद दोनों भाई वापस गांव आ गए। वहां से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए द्विवेदी जी ने सन् 1921 में ही वाराणसी जाकर काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के ज्योतिष में प्रवेश लिया। 1929 में द्विवेदी जी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।

इसके बाद जब ये मालवीय जी से आशीर्वाद लेने गये तो मालवीय जी बोले तुम हिन्दी के अच्छे विद्वान हो। रविन्द्रनाथ ठाकुर ने एक हिंदी अध्यापक मांगा है, पत्र लिख देता हूं, चले जाओ। मालवीय जी की कृपा से हजारी प्रसाद जी प्रारंभ में ही उस धरातल पर पहुंच गए, जहां से उनकी कीर्ति-पताका गगन में फहराने लगी। इसके बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उच्चकोटि के निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक, चिन्तक तथा शोधकर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए।

रचनाओं पर दिखती है व्यक्तित्व की छाप

आचार्य जी का व्यक्तित्व गरिमामय, चित्तवृत्ति उदार और दृष्टिकोण व्यापक है। द्विवेदी जी की प्रत्येक रचना पर उनके व्यक्तित्व की छाप देखी जा सकती है। उन्होंने सुर, तुलसी आदि पर जो विद्वत्तापूर्ण आलोचनाए लिखी हैं वे हिन्दी में पहले नहीं लिखी गईं। उनका निबंध हिन्दी साहित्य की स्थायी निधि है।

उनकी समस्त कृतियों पर उनके गहन विचारों और मौलिक चिंतन की छाप है। उनके निबंधों में दार्शनिक तत्वों की प्रधानता रहती है। हिन्दी साहित्य का इतिहास, भारतीय धर्मसाधना, सूरदास, कबीर आदि ग्रन्थ उनके साहित्य की परख और इतिहास बोध की प्रखरता को रेखांकित करते हैं। वाणभट्ट की आत्मकथा के साथ ही पुनर्नवा, चारूचन्द्रलेख, अनामदास का पोथा, जैसे ऐतिहासिक उपन्यास ऐतिहासिकता और पौराणिकता की रक्षा करते हैं।

कई विश्वविद्यालयों को दी अपनी सेवा
आचार्य जी ने कई वर्षों तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपसभापति, खोज विभाग के निदेशक तथा नागरी प्रचारिणी सभा के संपादक रहे। सन् 1950 में बीएचयू में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर रहे। इसके एक वर्ष पूर्व सन् 1949 में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उनकी हिन्दी की महत्वपूर्ण सेवा के कारण डी. लिट. की उपाधि प्रदान की थी।

सन् 1955 में वे प्रथम आफिशियल लैंग्वेज कमीशन के सदस्य चुने गये। उनको साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति द्वारा 1957 में 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया। सन् 1958 में वे नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य रहे। सन् 1960 में पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर होकर चण्डीगढ चले गये। सन् 1968 में ये फिर बीएचयू में डायरेक्टर नियुक्त हुए। इसके. बाद उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष हुए। 19 मई 1979 में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।  
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गांव आज भी है उपेक्षित

द्विवेदी जी की रचनाओं से आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व आलोकित हो रहा है, लेकिन उनका पैतृक गांव ओझवलिया अपनी पहचान को मोहताज नजर आ रहा है। गांव में आज तक उनकी एक प्रतिमा तक नहीं स्थापित है। एक तालाब का नाम हजारी सरोवर जरूर रखा गया है, लेकिन उसके सौंदर्यीकरण के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया। इससे गांव के लोग काफी दुखी हैं।
 
गांव में श्रद्धांजलि सभा का होगा आयोजन
द्विवेदी जी के गांव में हर साल 19 मई को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। इसमें देश के बड़े साहित्यकारों के साथ ही प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होते हैं। लेकिन इस दिन के अलावा कोई भी इस महान विभूति को याद नहीं करता। इस बार भी गांव में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जा रहा है। इसमें लाकडाउन के कारण काफी कम लोगों को बुलाया जा रहा है। सभा में साहित्यकार डॉ. जनार्दन राय व तहसीलदार सदर उपस्थित रहेंगे।
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