बहेरी के सरफराज खां का परिवार। । अमर उजाला
माहे रमजान में तपिश पर आस्था भारी रही। भीषण गर्मी के बाद भी मुसलमानों ने जोशो खरोश के साथ पहला रोजा रखा। युवा और बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्गों में गजब का उत्साह रहा। रमजान के पहले दिन ही नगर की मस्जिदें नमाजियों से गुलजार रहीं। शाम को अजान होते ही लोगों ने बारगाहे इलाही में दुआओं के लिए हाथ उठा दिए और फिर खजूर और पानी से रोजा खोला। वहीं इशा की नमाज में तरावीह अदा की गई।
भोर में उठकर लोगों ने सहरी कर रोजा रखने की नीयत की। दिन बढ़ा तो तपिश अपना रंग दिखाने लगी। लेकिन आस्था उस पर भारी पड़ी। रोजेदार तिलावत और इबादत में मशगूल रहे। पहले रोजे में ही बच्चों से लेकर बड़ों तक ने सब्र के इस इम्तहान को बखूबी पास किया। रोजे के पहले दिन मंगलवार को मस्जिदें नमाजियों से गुलजार रहीं। लोगों ने अल्लाह की बारगाह में दुआ के लिए हाथ उठाए। मगरिब की अजान होते ही लोगों ने खजूर और पानी से इफ्तार कर खुदा का शुक्रिया अदा किया। इससे पूर्व बाजारों में लोगों ने इफ्तार के सामान खरीदे। वहीं महिलाओं ने इफ्तारी के लिए दोपहर बाद से ही तैयारी शुरू कर दी थी।
जामा मस्जिद विशुनीपुर के इमाम अशरफ रजा ने बताया कि इस्लाम बरकत और पाक महीना है। रमजान इस माह की फजीलत को बयान करना आसान नहीं है। आम तौर पर ये समझा जाता है कि भूखे रहना रोजा है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। रोजा के इस महीने में कुरान नाजिल हुआ जो पूरी दुनिया में सादगी एवं मुहब्बत का पैगाम देता है। अगर रोजे के सभी अरकान से अपनाया जाय और उसके मुताबिक इबादत की जाय तो मोमिन इस तरह पाक हो जाता है। बताया कि रमजान के पाक महीने के दौरान मुसलमान रोजा रखकर परवरदिगार की इबादत करते हैं। रोजा खुदा नायाब तोहफा है। बरकत के महीने में मुसलमान बच्चे मन से इबादत करते हैं।