इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स की कार्यशाला का दीप प्रज्जवलित कर शुभारंभ करते अतिथिगण।
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नवजात शिशु के लिए उसके जन्म के बाद पहला मिनट बहुत बड़ा महत्व होता है। यही कारण है कि चिकित्सक इस पहले मिनट को गोल्डेन मिनट मानते है। यह अवधि बच्चे के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। यदि इस समय एक कुशल चिकित्सककर्मी की मदद उपलब्ध हो तो सभी नवजातों में स्वत: श्वसन प्रक्रिया स्थापित की जा सकती है। यह बातें संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ के वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ डा. पियाली भट्टाचार्य ने कहीं।
वह रविवार को नगर के अग्रवाल धर्मशाला में इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स बलिया शाखा के संयोजकत्व में आयोजित नियोनेटल रिससिटेशन प्रोग्राम प्रथम गोल्डेन मिनट कार्याशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस गोल्डेन मिनट के जरिये आक्सीजन की कमी से होने वाली स्थाई विकृतियों के साथ ही शिशु को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता हैं। कार्यशाला में डा. भट्टाचार्य के अलावा जौनपुर के बालरोग विशेषज्ञ डा.तेजसिंह और वाराणसी के बालरोग विशेषज्ञ डा. राजीव रंजन ने प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण दिया। कार्यशाला के मुख्य संयोजक वाराणसी के प्रसिद्ध बालरोग विशेषज्ञ डा. धीरज मोहन गुप्ता थे।
कार्यशाला में चार सब स्टेशनों पर डमी नवजात शिशुओं को स्वत: श्वसन प्रारम्भ करने के लिए उपयुक्त तकनीकि से सभी प्रतिभागियों को पारंगत किया गया। इस मौके पर वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ अशोक कुमार सिंह, डा. राजेश केजरीवाल, डा. अजीत सिंह, डा. आशु सिंह, डा. डी प्रसाद, डा. आफताब आलम आदि मौजूद रहे।