पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की जयंती पूरे देश में मनाई जा रही है। चाचा नेहरू बच्चों को बेहद प्यार करते थे। बावजूद उनकी जयंती के उपलक्ष्य में बच्चों के प्रिय साहित्य को बढ़ावा देने के लिए अब कोई योजना नहीं बनती। बाल साहित्यों या उनको खेलने के लिए पार्कों में व्यवस्था नहीं की जा रही है। आलम यह है कि समाज में बच्चों को ही दरकिनार कर दिया गया है। यही नहीं उनसे बाल मजदूरी तक कराया जा रहा है। ऐसे में साहित्य ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में बच्चों की उपेक्षा हो रही है।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का बच्चों को काफी लगाव था। लेकिन उनके नाम पर विगत एक दशक से बच्चों के लिए लिखी जाने वाली साहित्य पुस्तकों को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। जिससे बाल सहित्य दम तोड़ता नजर आ रहा है। बुद्धिजीवी इसके लिए पूंजीवादी और तकनीकी युग को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
एक समय था जब बाल साहित्य की पत्रिकाएं जैसे चंपक, नंदन, चंदा मामा, कामिक्स चाचा चौधरी हर घर में पढ़ी जाती थी। लेकिन अब आलम यह है कि शायद ही कोई ऐसा घर हो जिस घर में बच्चों को पढ़ने के लिए बाल साहित्य रखा गया हो। चाचा चौधरी जैसे कामिक्स कभी घर-घर में बच्चों को पढ़ने के लिए हुआ करता था। लेकिन गत एक दशक में समाज में इतना बदलाव आया है कि अब बच्चे इंटरनेट, वीडियो गेम और टीवी कार्टून को वरीयता दे रहे हैं।
अभिभावक भी बच्चों को बाल साहित्य पढने के लिए प्रेरित नहीं करते। वहीं नगरों में स्थित पार्कों में बच्चों को खेलने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में बच्चे अपना अधिकतम समय वीडियो और मोबाइल गेम खेलने के साथ ही टीवी कार्टून देखने में बिताते हैं, जिसका बच्चों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
शिक्षाविद एवं एसजीएम सुरही के प्राचार्य डा. पंकज चौधरी का कहना है कि इधर एक दशक में टीवी चैनलों ने बाल साहित्य को पूरी तरह से बाहर कर दिया है। अब बच्चे वीडियो गेम और टीवी चैनलों में उलझ कर रह गए हैं। बाल सहित्य पढ़ने का उनके पास समय ही नहीं और न ही कोई प्रेरित कर रहा है।
टीवी पर बच्चों के लिए प्रसारित होने वाले काटूर्नों में सामाजिक मूल्यों की उपेक्षा देखी जाती है, जो बच्चों के स्वस्थ्य व्यक्तित्व के निर्माण को प्रभावित करता है। समय के साथ नेहरू की नीतियां भी निष्प्रभावी हो चुकी हैं। बावजूद उसका असर देश पर हर क्षेत्र में दिखता है।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. दीपक कुमार राय कहते हैं कि बच्चे जब बाल साहित्य पढ़ते हैं तो उनका मानसिक विकास तेजी से होता है। लेकिन टीवी युग ने बाल साहित्यों के महत्व को कम कर दिया है। यही नहीं बाल फिल्मों का निर्माण भी अब नाम मात्र को हो रहा है। बाल साहित्य को लिखना और बाल फिल्म बनाना काफी कठिन होता है।
ऐसे बाल साहित्य की जरूरत है जिसको बच्चे टीवी और वीडियो गेम को छोड़ पढने के लिए बाध्य हों। लेकिन हकीकत में देखा जाए तो बाल साहित्य के प्रति रूचि नाम मात्र की ही रह गई है। वहीं नेहरू की नीतियां समय के हिसाब से प्रभावित जरूर हुई हैं। लेकिन आज भी उसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।