ऐतिहासिक ददरी मेले का समापन सोमवार को हुआ। इस दौरान सोमवार को भी संडे जैसा नजारा रहा। जबकि बहुत से दूकानदार अपने-अपने सामानों को समेटते नजर आए। लोगों ने झूलों का आनंद लिया। चाट-पकौड़े का भी लोगों ने जमकर लुत्फ उठाया। वहीं दूकानदार भी आज तोलमोल पर ज्यादा जोर नहीं दे रहे थे। लिहाजा लोग सस्ते में अपने जरूरत के सामानों की खरीद रहे थे।
ददरी मेले का समापन रविवार को होना था। लेकिन भीड़ के मद्देनजर नपा प्रशासन ने एक दिन और बढ़ाते हुए सोमवार को समापन का ऐलान किया। ऐसे में सोमवार को भी मेले में रविवार जैसी भीड़ उमड़ पड़ी। इस दौरान लोगों ने जमकर खरीदारी की। समापन के मौके पर लोगों को सस्ते में भी सामान मिला। झूले-खर्ची खचाखच रही।
ददरी मेले में ग्रामीण सहित नगर के इलाकों से आए लोगों ने रविवार को रेडिमेड, ऊनी तथा चादरों की खरीदारी की, जहां झूले-चर्खियों पर कतारें लगी हुई थी। चाट-छोले की दूकानें भी गुलजार रही। अंतिम दिन संडे पड़ने के चलते सरकारी कर्मचारी, ग्रामीण लोग मेले में पहुंच गए। मेले में आए लोगों ने क्राकरी, किचेन और लकड़ी के बने सामनों की जमकर खरीद्दारी की।
वहीं चौकी, पलंग, मेज, सोफा के दूकानदार संडे को भी नोटबंदी का असर बता रहे थे। दूकानदारों का कहना था कि इस बार मेले में उनकी बिक्री न के बराबर हुई है। लोगों ने जैसे-तैसे जुटाए पैसे से ही खरीद्दारी की है। जबकि हर बार ददरी मेले में शादी, विवाह के मद्देनजर पलंग, सोफा आदि की खरीदारी ददरी मेले से ही करते थे। दूकानदारों की मानें तो उन्हें लाखों रुपये का नुकसान हुआ। जिसके पीछे नोटबंदी सबसे बड़ा मुद्दा है।