बलिया। लाल बालू का गोरखधंधा जिले में नासूर हो चुका है और इस पर रोक लगाने में जिला प्रशासन पूरी तरह फेल है। इस काले खेल से कई विभागों के अफसर, कर्मचारी के साथ ही बालू माफिया जहां लाल हो रहे हैं वहीं आम लोग शोषण का शिकार। बैरिया क्षेत्र में विधायक व वनकर्मियों के बीच हुए विवाद के पीछे भी यही कारण माना जा रहा है।
जिले में प्रांतीय सीमाओं के रास्ते लाल बालू का गोरख धंधा सालों से जनपद में चल रहा है। लेकिन वर्ष 2014 में नरहीं थाना के भरौली गंगा पुल के भारी वाहनों के लिए बंद होने के कारण छोटे वाहनों से सीधे तौर तस्करी शुुरु हो गई। नियमों को देखें तो बिहार प्रांत से आने वाले लाल बालू के लिए वाणिज्य कर विभाग की ओर से शुल्क जमा करा कर फार्म 31 जारी किया जाता है। इसके आधार पर ही संबंधित फर्म बिहार प्रांत में रायल्टी जमा कर ट्रकों से प्रदेश की सीमा में लाते हैं। हालांकि सीमा पर वन विभाग की ओर से वन उपज के आधार पर लाल बालू पर अभिवहन व पंजीकरण शुल्क की वसूली की जाती है। लेकिन इसमें बड़े पैमाने पर गड़बड़झाला किया जाता है। आलम यह है कि भरौली व बैरिया पुल के रास्ते आम आदमी घर बनवाने के लिए एक ट्रैक्टर बालू नहीं ला सकता है जबकि माफियाओं की ओर से रोजाना हजारो ट्राली इन दोनों रास्ते से प्रदेश में अवैध तरीके से लाया जाता है और उंचे दामों पर बेचा जाता है। इसके अलावा नरहीं थाना के कोटवां नारायणपुर से लेकर बैरिया तक दर्जनों स्थानों पर बड़े पैमाने पर बड़ी नाव स्टीमर से लाल बालू की तस्करी की जाती है। इसकी जानकारी वाणिज्य कर, पुलिस, वन विभाग, राजस्व विभाग, खनन विभाग सभी को होती है लेकिन सभी चुप्पी साधे रहते हैं, जो कई संकेत देते हैं। आलम यह है कि यदि आम आदमी घर बनाने को एक ट्रैक्टर लाल बालू लाता है तो उसे कई विभागों की नौटंकी का सामना करना पड़ता है लिहाजा वह भी माफियाओं से ही महंगे दामों पर खरीदने का मजबूर हैं। सूत्रों की मानें तो लाल बालू का खदान बिहार प्रांत के कोईलवर में है और नजदीकी रास्ता भरौली से रोजाना सैकड़ों मिनी ट्रक लाल बालू की तस्करी होती है।
इनसेट
लाल बालू के अवैध आवक को लेकर कई टीमें गठित की गई हैं और समय-समय छापेमारी कर बालू सीज भी किया गया है। इस बाबत लगातार मॉनीटरिंग की जा रही है और जल्द ही नदियों के रास्ते आने वाले बालू की निगहबानी का इंतजाम किया जाएगा।
मनोज सिंघल
एडीएम, बलिया