बलिया। जिले में ज्यादातर रोडवेज बसों की हालत काफी खराब है। इन पर सफर करना कितना सुरक्षित है, ये सफर करने वाले बखूबी जानते हैं। कौन सी बस कहां दगा दे जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। खटारा बसें और उनमें जर्जर सीटें, खिड़कियों से गायब शीशों के कारण अंदर आती धूल यह सब यात्रियों को रोडवेज की बसों में झेलना पड़ता है। बसों के खटारा होने के चलते ही इनके दुर्घटना की संभावना अधिक होती है। जौनपुर में बुधवार को रोडवेज की बस के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद यात्रियों में बसों में यात्रा करने को लेकर भय का माहौल बनता जा रहा है, उनका कहना है कि बसों की स्थिति जर्जर होने की दशा में कभी भी दगा दे सकती है।
बलिया रोडवेज डिपो से कुल 84 बसों का संचालन होता है, इसमें 65 बसें रोडवेज की हैं, जबकि 19 बसें अनुबंधित हैं। बलिया से राजधानी लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, गाजीपुर इत्यादि जिलों के लिए बसें नियमित रूप से खुलती हैं। इसके अलावा जनपद के भीतर भी कुछ बसों का संचालन होता है, जो विभिन्न ब्लाकों से होते हुए गंतव्य तक पहुंचती हैं। विभागीय अधिकारियों की माने तो रोडवेज को प्रति माह दस से 12 लाख रुपये का मुनाफा होता है। रोडवेज के वर्कशाप में चार से पांच बसें हर रोज केवल मरम्मत के लिए ही खड़ी रहती हैं। यात्रियों का कहना है कि रोडवेज का किराया निजी बसों से अधिक होता है लेकिन जब सुविधाएं देने की बात होती है तो उनका प्रदर्शन पीछे हो जाता है।
बसों की नहीं होती नियमित सफाई
स्वच्छ भारत मिशन का असर कम से कम रोडवेज बसों में तो बिल्कुल नहीं दिखता। बस के अंदर फैली गंदगी की वजह से यात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सीटों पर धूल गर्दा साफ करने की कोई व्यवस्था नहीं होती है। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि जब बसों की खिड़कियों के शीशे जर्जर हालत में हैं तो धूल गर्दा अंदर आने से कैसे रोका जा सकता है।
मेंटीनेंस के नाम पर होता है खेल
बलिया। रोडवेज बसों को दुरुस्त करने के लिए वर्कशॉप है। वर्कशॉप में मौजूद कर्मचारी से लेकर चालक और परिचालक मेंटीनेंस के नाम पर निगम को हजारों रुपये का चूना लगाते हैं। इसके साथ ही वाहनों से भी खिलवाड़ करते हैं।
वर्जन =
रोडवेज की सारी बसें दुरुस्त हैं, यदि किसी बस में कोई कमी होती भी है, तो उसे वर्कशॉप में भेजकर ठीक कराया जाता है। - पवन कुमार श्रीवास्तव, सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक