दुबहर। आजादी की जंग में सबसे पहले अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी हुकूमत के चूल हिलाने वाले शहीद मंगल पांडेय में शुरू से ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का जज्बा था । उनके इसी जज्बे ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बने आंदोलन में लोगों के अंदर स्वाभिमान जगाने का काम किया।
30 जनवरी 1831 को तत्कालीन गाजीपुर जिले के बलिया तहसील अंतर्गत नगवा गांव की मिट्टी में मंगल पांडेय का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था । पिता का नाम सुदिष्ट पांडेय तथा माता का नाम जानकी देवी था । मंगल पांडेय 22 वर्ष की आयु में ईस्ट इंडिया कंम्पनी की सेना में भर्ती हुए। उस समय सेना में धर्म के अनुसार वेशभूषा में रहने की छूट थी , हिंदू सिपाहियों के लिए माथे पर तिलक लगाना और मुसलमान सिपाहियों को दाढ़ी रखना आम बात थी । उस समय सेना में अंग्रेजों की ओर से सैनिकों को ईसाई बनाने का कुचक्र चल रहा था। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में एक फैक्ट्री थी, जहां कारतूस बनाए जाते थे, उस फैक्ट्री के अधिकांश कर्मचारी दलित समुदाय के थे । एक दिन प्यास लगने पर फैक्ट्री के एक कर्मचारी ने सैनिक मंगल पांडेय से एक लोटा पानी मांगा । उन्होंने यह कहकर पानी देने से मना कर दिया कि वह अछूत है। कर्मचारी को यह बात चुभ गई। उसने मंगल पांडेय से कहा कि उस समय तुम्हारा धर्म कहां रह जाता है, जब बंदूक में कारतूस डालने से पहले उसे दांत से तोड़ते हो उस कारतूस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती है । वह दलित कर्मचारी मातादीन था । जिसने भारतीय सैनिकों की आंखें खोल दी।
इसके बाद मंगल पांडेय अंग्रेजों से बदला लेने के लिए मौके की तलाश में लग गए। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने अंग्रेजो के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया और परेड ग्राउंड में ही बगावत कर अंग्रेज अफसरो को मौत के घाट उतार दिया। तभी वहां कर्नल ह्वीलर पहुंचा, उसने सिपाहियों से मंगल पांडेय को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। लेकिन एक भी सैनिक आगे नहीं आया। बाद में मंगल पांडेय को गिरफ्तार कर लिया गया। फौजी अदालत में उन पर मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी। बैरकपुर के परेड मैदान में फांसी का मंच बनाया गया 7 अप्रैल को सुबह फांसी दी जानी थी ,परंतु जल्लाद ने फांसी देने से मना कर दिया। अंत में कोलकाता से जल्लाद बुलाए गए और 8 अप्रैल को प्रात: 5:30 बजे मंगल पांडेय को फांसी पर चढ़ा दिया गया । मंगल पांडेय के इस बलिदान ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया । इनके बलिदान के बाद जगह-जगह अंग्रेजो के खिलाफ बगावत तेवर दिखाई देने लगे, जिसका परिणाम 15 अगस्त 1947 को सामने आया जब हमेशा के लिए अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए।