बहराइच। वन्य जीवों के प्राकृतिक प्रवास और सुरक्षा को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन तराई में सूरज की तपिश बढ़ने के साथ ही कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में वन्य जीवों के लिए पानी का संकट एक बार फिर दस्तक दे रहा है। जंगल में स्थापित तालाब और पोखरे सूख रहे हैं। ऐसे में पानी के लिए वन्य जीवों को कोसों भटकना पड़ेगा। इससे न सिर्फ वन्यजीवों के हमले बढ़ेंगे, बल्कि मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में भी इजाफा हो सकता है। संकट बड़ा है, लेकिन अभी तक इससे निपटने के लिए वन विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
उत्तर प्रदेश को देश दुनिया में पहचान दिलाने वाले कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में विहार करने वाले वन्यजीवों को प्रतिवर्ष पानी के संकट से जूझना पड़ता है। इस बार फिर भीषण गर्मी शुरू हो गई है। तराई का तापमान झुलसने जैसा अहसास करा रहा है। शहर, कस्बों और गांवों में अभी से गर्मी से बुरा हाल है, वहीं कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में भी पानी का संकट दस्तक दे रहा है।
विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने वाला कतर्नियाघाट वन क्षेत्र 551 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। कतर्नियाघाट में लगभग 59 बाघ व 150 से अधिक तेंदुए हैं। हिरण की विभिन्न प्रजातियों की संख्या लगभग साढ़े पांच से छह हजार के मध्य है। इनमें बारहसिंगा, काकर, पाढ़ा समेत अन्य वन्य जीव भी कतर्निया की शोभा हमेशा से बढ़ाते आए हैं। इसके अलावा गैंडे और हाथी भी प्रवास करते हैं, लेकिन गर्मी में इन वन्य जीवों के सामने पानी की विकराल समस्या उत्पन्न हो जाती है।
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सिर्फ 12 वाटर पोल पर निर्भर है हजारों वन्यजीवों की जिंदगी
कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के सात रेंजों में हजारों छोटे-बड़े वन्यजीव प्रवास करते हैं। इन वन्यजीवों को पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए मुर्तिहा व ककरहा रेंज में 12 वाटर पोल वन विभाग की ओर से वर्षों पहले बनवाए गए थे। इसके अलावा अन्य रेंजों में दर्जन भर तालाब व नाले भी हैं, लेकिन भीषण गर्मी से ये स्रोत सूखने के कगार पर हैं।
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बैराज की मरम्मत के लिए होता है क्लोजर, सूख जाती हैं दोनों नदियां
कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के कतर्नियाघाट रेंज के बीच से होकर बहने वाली गेरुआ और कौड़ियाला नदी का पानी भी वन्य जीवों के लिए जिंदगी का आसरा होता है, लेकिन प्रतिवर्ष बरसात के पहले मई में गेरुआ और कौड़ियाला नदी पर बने चौधरी चरण सिंह गिरिजा बैराज की मरम्मत के लिए 20 से 25 दिनों के लिए क्लोजर किया जाता है। इस दौरान नदी का पानी सूख जाता है। इसके चलते वन्यजीवों को भटकने की नौबत आती है।
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पानी की तलाश में आबादी की ओर आते हैं वन्यजीव
भीषण गर्मी में प्यास बुझाने के लिए वन्यजीवों के कदम जंगल के आसपास स्थित गांवों की ओर बढ़ते हैं। इसके चलते बाघ और तेंदुओं के हमलों में इजाफा होता है। अप्रैल के शुरुआती दौर से अब तक कई हमले हो भी चुके हैं। दो दिन पूर्व कतर्नियाघाट रेंज में तेंदुए ने दो घरों में घुसकर मवेशियों को निवाला बनाया था। परिवारीजन मकान के अंदर थे, जिससे बच गए। विभागीय जिम्मेदार इस मामले में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं, जबकि वन्य जीवों को पानी की तलाश में 60 से 70 किलोमीटर भटकना पड़ता है।
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कतर्नियाघाट वन क्षेत्र में गर्मी के दिनों में वन्यजीवों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए तीन सोलर संचालित पंप, मनरेगा से बनाए गए तालाब हैं। इसके साथ ही टैंक से पानी भरने की भी व्यवस्था है।
बी शिवशंकर डीएफओ