बहराइच। किसी भी कामयाबी का राज तो बस इतना है यारों, चलो तो... रास्तों पर नहीं अपने पैरों पर ऐतवार करना। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं का सम्मान होता है। ऐसे माहौल में महिलाएं सम्मान की चाहत के बगैर अपने काम में लीन रहती हैं। वह कहती हैं कि असली सम्मान तब मिलता है। जब हम अपने स्तर से सेवा करके दूसरों को न्याय दिलाने में कामयाब होते है और उनके आंखों से निकलने वाले आंसू खुशी के होते है। वहीं हमारा सबसे बड़ा सम्मान होता है। अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान दिवस पर अमर उजाला ने जिले में अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही महिला अधिकारियों व समाजसेवियों से बात की है। प्रस्तुत है रिपोर्ट-
परिवार को जोड़ने के साथ दिला रही न्याय
बचपन से जब से पढ़ाई करने की ललक पैदा हुई। तभी कुछ कर दिखाने का चाहत रही। हमेशा पढ़कर समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने के साथ समाज के लोगों की मदद करने की इच्छा बनी रही। साल 2017 में नौकरी ज्वाइन की और आज टूटे रिश्ते को जोड़ने के साथ समाजसेवा का कार्य कर रही हूं। लोगों में जागरूकता फैला रही हूं। इस कार्य से काफी संतुष्ट हूं।
-शिखा यादव, सचिव विधिक सेवा प्राधिकरण
फरियादियों को न्याय दिलाना प्राथमिकता
सिविल सर्विस में आने के लिए इंटर के बाद ही फैसला कर चुकी थी। आगे की पढ़ाई शुरू हुई तो समाज सेवा करने का मौका भी संस्थाओं के माध्यम से मिलता रहा। पढ़ाई पूरी होने के बाद सिविल सर्विस के लिए प्रयास की और सफलता मिल गई। यह एक ऐसा मंच है। जहां से क्षेत्र में कार्य करने के साथ फरियादियों को न्याय दिला सकती हूं। जिले में मेरा चौथा पोस्ट है। फरियादियों को न्याय दिलाना ही मेरी प्राथमिकता है।
-ज्योति राय, सिटी मजिस्ट्रेट बहराइच
टीचर बनती तो शायद इतनी सेवा न कर पाती
मैं शुरू से चाहती थी कि मैं टीचर बनूं और बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें उनके मंजिल तक पहुंचा सकूं, लेकिन शायद यह ऊपर वाले को मंजूर न था। कुछ ऐसी परिस्थितियां मेरे सामने अचानक आ गईं कि मुझे पुलिस की नौकरी को ज्वाइन करना पड़ा। जब मैं वर्दी पहनी और फरियादियों को अपने माध्यम से न्याय दिलाने की ओर कदम बढ़ाया तो खुशी की अनुभूति हुई। अब एहसास हो रहा है कि टीचर बनती तो शायद इतनी सेवा न कर सकती। जितना अभी करने का मौका मिल रहा है।
-शीला यादव, महिला थानाध्यक्ष
दिव्यांग बच्चों की शिक्षा के लिए नहीं की शादी
30 साल से दिव्यांग बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रही हूं। दिव्यांग बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए शादी नहीं की। आज के समय में लगभग 50 बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का काम कर रही हूं। बच्चों की परवरिश का भी पूरा ख्याल कर रही हूं। कोरोना काल के बाद बच्चों की संख्या में गिरावट आई है, लेकिन आम समय में 150 बच्चों से अधिक की संख्या में विद्यालय में बच्चों की मौजूदगी रहती है। इस कार्य के लिए मुख्यमंत्री तक भी सम्मानित कर चुके हैं।
-डॉ. बलमीत कौर, प्रबंधक बाबा सुंदर सिंह बधिर विद्यालय
देखने से मन में तमन्ना हुई, आज सिखा रही तीरंदाजी
उस समय मैं इंटर की पढ़ाई कर रही थी। मेरे घर के पास में एक लड़की तीरंदाजी कर रही थी। तभी मन में सीखने की तमन्ना हुई। बस उसी दिन ठाना कि एक अच्छा तीरंदाज बनकर लोगों को भी सिखाऊंगी। इस सफलता में मेरी मां रवि देवी ने पूरा साथ दिया। पढ़ाई से लेकर तीरंदाजी के मैदान में आने तक मेरी मां ने हर कदम पर साथ दिया। जिससे आज मैं इस मुकाम पर पहुंची हूं। इस समय 25 से 30 बच्चें तीरंदाजी सीख रहे हैं।
-अनुपमा धानुक, उप क्रीड़ा अधिकारी
परिवार का सपना किया साकार
बचपन से ही सरकारी नौकरी करने का सपना था। परिवार के लोगों का पूरा सहयोग मिला और 2007 में नौकरी भी मिल गई। नौकरी मिलने के बाद फील्ड का काम मिला, लेकिन एक बार भी हिचक पैदा नहीं हुई। आरोपियों को पकड़ने के लिए लगातार दबिश देकर शिकंजा कस रही हूं। साथ में पांच साल का एक बेटा भी है। बावजूद इसके अपनी मंजिल को पाने के लिए हर कठिनाइयों का सामना कर मिसाल पेश कर रही हूं।
-अर्चना पांडेय, आबकारी इंस्पेक्टर
बाल विवाह रोक विद्यालय में बढ़ाई बालिकाओं की संख्या
क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या बाल विवाह व प्राथमिक विद्यालय में बालिकाओं का प्रवेश न कराना रहा। यह एक चुनौती रही। जिसे मैंने अपनी मेहनत से दूर कर दिया। बच्चियों को बाल विवाह से रोकने के साथ उनका स्कूलों में प्रवेश कराया कर चुनौती से निपटने का काम किया। आज के समय में पयागपुर के बेलवापदुम में बाल विवाह नहीं हो रहा है और विद्यालय में बालिकाओं की अच्छी संख्या है। अब मैंने यह चुनौती के कार्य को पूरा कर एक नजीर पेश करने का काम किया है।
-प्रीति मिश्रा, शिक्षका
बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना होगी प्राथमिकता
जनपद शैक्षणिक दृष्टि से काफी पिछड़ा है। ऐसे में मेरे द्वारा जनपद में बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। नगरपालिका की ओर से मुझे स्वच्छता मिशन का ब्रांड एंबेसडर भी नियुक्त किया गया है। ऐसे में मैं नगर की सफाई व्यवस्था को सुदृढ़ करने में अपना योगदान दे रही हूूं।
-डॉ. प्रिया मुखर्जी, प्राचार्या महिला पीजी कॉलेज