बहराइच। कतर्नियाघाट वन्यजीव क्षेत्र में अब जंगल की तस्वीर बदलने लगी है। तेंदुए अब जंगल नहीं, बल्कि जंगल से सटे गन्ने के घने खेतों को ही अपना नया ठिकाना मान चुके हैं। इन खेतों में रहने वाले तेंदुओं की पहचान अब केन तेंदुआ के रूप में हो रही है। दूसरी तरफ, बाघ भी अब अपने पारंपरिक इलाकों को दूसरों के साथ बांटने को मजबूर हैं।
प्रकृति के संतुलन में हो रहे छोटे-छोटे परिवर्तन अब बड़े बदलाव का रूप ले रहे हैं। वन्यजीवों के व्यवहार में आ रहे इन बदलावों की बानगी कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में देखने को मिल रही है। बदलाव के चलते बाघ और तेंदुओं के व्यवहार में भी अंतर दिखाई पड़ रहा है। पहले जहां एक बाघ का जोड़ा करीब 10 किलोमीटर के इलाके (टेरिटरी) में अकेले रहता था, वहीं वन विभाग द्वारा हाल ही में किए गए अध्ययन से पता चला है कि अब कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में सिर्फ 18 किलोमीटर के दायरे में आठ बाघ रह रहे हैं। यानी अब बाघों ने भी अपना इलाका दूसरों के साथ साझा करना शुरू कर दिया है।
बाघ ही नहीं, तेंदुए भी अब अपना ठिकाना और रहन सहन के साथ व्यवहार बदल कर दो खेमों में बंट चुके हैं। कुछ तेंदुए अब जंगल छोड़कर गन्ने के खेतों में रहने लगे हैं। इन्हें अब वन विभाग की भाषा में केन तेंदुआ कहा जा रहा है। इनकी संख्या कतर्निया क्षेत्र में करीब सौ बताई जा रही है।
ये तेंदुए खेतों में ही रहते हैं और गन्ना कटने के बाद आसपास की झाड़ियों या बागों की झाड़ियों में चले जाते हैं। कतर्नियाघाट के आसपास खेतों में निवास करने वाले ऐसे तेंदुओं की संख्या करीब 100 के आसपास मानी जा रही है। डीएफओ ने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान पता चला है कि ये केन तेंदुए जंगल की तरफ जाते ही नहीं गन्ने के खेत ही अब इन्हें जंगल जैसे लगने लगे हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ तेंदुए अब भी जंगलों में ही रहते हैं, जिनकी संख्या करीब 125 से 150 के बीच है। यानी अब तेंदुए दो खेमों में बंट गए हैं, एक जो खेतों में रहते हैं और दूसरे जो जंगल में।
केन तेंदुए ही बन रहे मानव वन्य जीव संघर्ष का कारण
तेंदुआ एक ऐसा मांसाहारी वन्यजीव है जो बकरी से लेकर चूहे तक सब खा सकता है। गांवों में जो जानवरों के हमले हो रहे हैं, उनमें ज्यादातर खेतों में रहने वाले यही केन तेंदुए शामिल हैं। इसके चलते अक्सर मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी सामने आती हैं।
क्या कहते हैं जंगल के जानकार
जंगल के जानकारों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं, इंसानों की आवाजाही बढ़ रही है, जिससे जंगल में रहने वाले वन्य जीवों को शिकार मिलना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में तेंदुए गन्ने के खेतों में खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि वहां छिपने और शिकार करने की पूरी सुविधा मिल रही है। लेकिन वन्य जीवों के आबादी की ओर रुख करने से इंसानों और जानवरों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह बदलाव चिंता का विषय है।
कर रहे निगरानी
कतर्नियाघाट वन प्रभाग के डीएफओ बी शिवशंकर ने बताया का कहना है कि हम लगातार निगरानी कर रहे हैं और ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए अभियान भी चलाए जा रहे हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष का ग्राफ एक नजर में
वर्ष घायल लोग मृतक
2022–23 58 17
2023–24 58 06
2024–25 57 13
2025–26 05 01
घायल लोग - 178
हमले में मृत - 37
नोट - सबसे ज्यादा हमले : तेंदुए, भालू और जंगली सुअर द्वारा किए गए।