तराई में पारा लगातार बढ़ता जा रहा है। लगातार बढ़ते पारे के बीच ही पानी की किल्लत की समस्या से भी लोगों को जूझना पड़ रहा है। औसतन एक व्यक्ति को प्रतिदिन 70 लीटर पानी की जरूरत होती है। लेकिन जलकल और जल निगम मिलकर भी 30 लीटर की आपूर्ति को पूरा नहीं कर पा रहा है। जिसके चलते लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
जनपद की आबादी लगभग 36 लाख के करीब है। जनपद की आबादी को पेयजल की आपूर्ति के लिए जल निगम की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में 16 पानी की टंकियां स्थापित हैं। जिनसे लगभग 10 हजार किलोलीटर पानी की आपूर्ति प्रतिदिन की जाती है।
इससे 10 लाख की आबादी को संतृप्त करने का दावा जल निगम कर रहा है। जबकि जलकल विभाग की ओर से शहरी क्षेत्रों में मुख्य घंटाघर से 750 किलोलीटर की क्षमता की टंकी से पानी आपूर्ति करने के साथ ही ट्यूबवेल और अन्य टंकियों से पांच लाख की आबादी को पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने का दावा किया जाता है। जल निगम के मानकों के अनुसार प्रतिदिन 70 लीटर पानी की आवश्यकता एक व्यक्ति को पड़ती है। इसके बावजूद भी जिले में तीस से 40 लीटर तक ही पानी लोगों को मुहैया हो पा रहा है।
टुल्लू और समरसेबल बोरिंग बनी सहारा
शहरी इलाकों में लोगों को घरों में पेयजल आपूर्ति का दावा महज खोखला साबित हो रहा है। शहरी क्षेत्र में लोगों को घरों में टुल्लू और समरसेबल बोरिंग कराने की मजबूरी है। इसके अलावा कई बार गंदगी से भरे पानी की आपूर्ति की शिकायतें भी जलकल विभाग को मिल चुकी हैं।
शुद्ध पानी छोड़िए, टोंटी ही रहती सूखी
शहर व ग्रामीण अंचलों में पानी की उपलब्धता का हाल जानने के लिए लोगों को कुरेदा गया तो सभी व्यवस्था पर फायर दिखे। सेमरी बाजार निवासी संतोष वर्मा का कहना है कि वाटर टैक्स लेने में प्रशासन सबसे आगे रहता है। जबकि पेयजल की आपूर्ति को दुरुस्त करने के कोई प्रयास नहीं किए जाते हैं।
मिहींपुरवा बाजार के निवासी पीयूष मौर्या ने कहा कि मानक के अनुरूप पानी की बात तो छोड़िए अक्सर पेयजल की किल्लत से गुजरना पड़ता है। सेमरी मलमला निवासी आशीष और कंचनपुर निवासी तिलकराम का कहना है कि पानी की समस्या को लेकर कई बार पत्र सौंपा गया। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
बचे हैं सिर्फ 2200 कुएं
वर्ष 2011 में जिले में कुए की संख्या 6500 के आसपास थी। लेकिन समय के साथ कुंए पटते चले गए। अब महज 2200 कुंए ग्रामीण अंचलों में स्थापित हैं। शहर और कस्बों में तो कुुंओं का नामोनिशान ही नहीं है। ग्रामीण अंचलों में जो कुंए हैं, उनमें भी मामूली पानी है। साफ सफाई कभी नहीं होती।