संगठनों के बीच अब सवाल यह है कि यदि नेपाल की सनातन पहचान को संवैधानिक मान्यता मिलती है तो उसका मॉडल क्या होगा। क्या सनातन धर्म को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक पहचान देते हुए सभी धर्मों की समान स्वतंत्रता बरकरार रहेगी? क्या संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ व्यवस्था को बदला जाएगा? या इसके लिए व्यापक राजनीतिक सहमति और संविधान संशोधन का रास्ता अपनाया जाएगा? अभी सरकार की ओर से कोई अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन देउबा का बयान और उनके गुट का प्रस्ताव बहस को सड़क से राजनीतिक और संवैधानिक मंच तक जरूर ले आया है।