कतर्नियाघाट के मोतीपुर रेंज में शावकों के साथ दिखी बाघिन को ग्रामीणों ने तो देखा है। लेकिन अभी वनाधिकारी उसकी झलक नहीं पा सके हैं। हालांकि अनुभव और बाघों की आदत के मुताबिक विशेषज्ञ यह बता रहे हैं कि बाघिन शावकों के साथ होने पर टेरीटरी बदलती रहती है और अक्सर आबादी के नजदीक के जंगल में ही रहती है।
जिस क्षेत्र में बाघिन शावकों के साथ दिखी है। उस क्षेत्र में वर्ष 2012 में कैमरा ट्रैपिंग में बाघिन नजर आई थी। लेकिन उसके बाद दो साल से बाघिन नहीं दिखाई पड़ी थी। ऐसे में कहीं यह वही बाघिन तो नहीं, पहचान के लिए थर्मो सेंसर कैमरा लगाया गया है।
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र 551 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस वन क्षेत्र में वर्ष 2014 की गणना के मुताबिक 36 बाघ विचरण करते हैं। लेकिन मोतीपुर रेंज ऐसा रेंज है। जहां वर्ष 2012 के बाद हुई कैमरा ट्रैपिंग में एक भी बाघ का अस्तित्व नहीं मिला था। वर्ष 2012 में कैमरा ट्रैपिंग करने वाले डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी दबीर हसन बताते हैं कि उस समय एक बाघिन दो शावकों के साथ दिखी थी लेकिन बाघिन शावकों के साथ होने पर अपनी टेरीटरी छह से आठ माह तक बदलती रहती है। वह आबादी के नजदीक के जंगल में ही विचरण करती है।