बहराइच। कोरोना जागरूकता होर्डिंग्स घोटाले में प्रशासन स्तर पर चली लंबी रस्साकसी के बाद आखिरकार नतीजा सामने निकल कर आया। तीन सदस्यीय टीम की जांच में डीपीआरओ को दोषी पाया गया। डीएम ने शासन से कार्रवाई की संस्तुति करते हुए आरोप पत्र भेज दिया है। किसी भी तरह का भुगतान निजी कंपनी को न करने की बात कही गई है, जिसने गांव में होर्डिंग्स लगाई थीं।
कोरोना से बचाव व जागरूकता को लेकर 700 ग्राम पंचायतों में एक निजी कंपनी की तरफ से होर्डिंग्स लगाई गई थीं। जिसके भुगतान के लिए बिल भी पंचायतों को भेजा गया था। एक होर्डिंग की कीमत 9680 रुपये बिल में दर्शाई गई थी। 700 होर्डिंग्स की कुल रकम 67.76 लाख रुपये थी। अमर उजाला ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया।
जिलाधिकारी शंभु कुमार ने शुक्रवार को बताया कि होर्डिंग्स लगाने का कोई भी आदेश शासन या प्रशासन स्तर से नहीं दिया गया था। इसलिए इस मामले में एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई गई। कमेटी में मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. बलवंत सिंह, वरिष्ठ कोषाध्यक्ष अशोक प्रजापति और एई डीआरडीए आफताब अहमद थे। जांच में फर्जीवाड़ा सामने निकलकर आया। डीपीआरओ मामले में दोषी पाए गए। जांच रिपोर्ट के आधार पर डीएम ने शासन को आरोप पत्र भेजकर जिला पंचायत राज अधिकारी उमाकांत पांडेय के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति कर दी है। डीएम ने बताया कि इस मद में किसी तरह का कोई भुगतान निजी कंपनी को नहीं किया गया है।
किस बड़ी मछली को बचाना चाह रहा था प्रशासन?
अब जबकि होर्डिंग्स घोटाले के मामले में दोषी का पता भी चल गया है और कार्रवाई की संस्तुति भी कर दी गई है। ऐसे में कई सवाल प्रशासन के भीतर ही खड़े हो रहे हैं। पहला सवाल है कि शासन स्तर से कोई एडवायजरी जारी न होने के बावजूद एक निजी कंपनी ने इतनी होर्डिंग्स कैसे लगा दीं? दूसरा सवाल क्या ऐसा आदेश डीपीआरओ अपने स्तर से दे सकते थे? और तीसरा सवाल यह कि लॉकडाउन में जब पूरी तरह से बंदी चल रही थी, तो ऐसे में एक निजी कंपनी के वाहन को आवागमन करने के लिए हरी झंडी किसने दी? यह सारे सवाल कहीं न कहीं मन में संदेह पैदा कर रहे हैं कि आखिर प्रशासन किस बड़ी मछली को बचाना चाह रहा था।