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मौसम की बेरुखी से आलू व दलहनी फसलों पर संकट

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बहराइच। तराई में मौसम की बेरुखी से आलू, दलहनी और तिलहनों फसलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। बारिश व ओले गिरने से तराई के तापमान में तेजी से गिरावट आई है। इससे आम जनजीवन तो प्रभावित है ही, फसलों पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। आसमान से बर्फ की तरह रात में पड़ रहे पाले से सब्जी की फसल सुरक्षा पर संकट उत्पन्न हो गया है। दलहन की फसल तो चपेट में है ही, सबसे अधिक नुकसान सब्जियों के राजा आलू को हो रहा है। मौसम की बेरुखी से तिलहन की फसलों का भी खेल खराब होने लगा है। झुलसा, माहूं व फंफूदनाशी रोग का प्रकोप फसलों की सेहत बिगड़ रहा है। बारिश के साथ ओले गिरने से जंगली इलाके में फसलों को काफी नुकसान हुआ है।
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रबी सीजन में जनपद में मुख्य फसल के रूप में सरसों, मटर व आलू की बोआई की जाती है। इस वर्ष मटर पांच हजार हेक्टेअर, सरसों 15 हजार हेक्टेअर व आलू की 2250 हेक्टेअर क्षेत्रफल में बोआई की गई है। करीब एक सप्ताह से मैदानी व तराई क्षेत्रों में बारिश व बदले मौसम के मिजाज से तापमान में तेजी से गिरावट हो रही है। पारा चार डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका है। रात के समय तो स्थिति और विकराल हो जाती है। बीते दिनों शहरी क्षेत्र में हल्की बारिश हुई तो मिहींपुरवा जैसे वनाच्छादित क्षेत्र में बारिश के साथ ओले भी गिरे हैं। बारिश से मटर, सरसों, आलू व पछेती गेहूं की फसल को नुकसान होने की संभावना कृषि वैज्ञानिक जता रहे हैं।
फसल अनुसंधान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. एमपी सिंह ने कहा कि 22 डिग्री सेल्सियस से लेकर 28 डिग्री सेल्सियस तापमान तिलहन व दलहन फसलों के लिए काफी अच्छा है। इससे कम तापमान होने पर तिलहन व दलहन फसलों की प्रतिरोधक क्षमता पर असर पड़ने लगता है। फसल वृद्धि करने के बजाए अपने जीवन के लिए संघर्ष करने लगती है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से पिछले दिनों में तराई का मौसम बिगड़ा है, इसका असर विपरीत हो सकता है। बदली का सिलसिला चार से पांच दिन लगातार जारी रहा तो आलू में झुलसा, सरसों में मांहू रोग व अरहर में फलीछेदक कीटों का प्रकोप बढ़ेगा।
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किसान कीटनाशक का करें छिड़काव
कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमपी सिंह कहते हैं कि मौसम में लगातार हो रहे बदलाव से आलू व दलहनी फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। रबी दलहन व तिलहन फसलों में खरपतवार नियंत्रण करना अति आवश्यक है। आलू व सरसों फसल को पाले से बचाने के लिए खेत में नमी रखें। उन्होंने कहा कि यदि आलू, सरसों व मटर में किसानों को झुलसा का प्रकोप दिखे तो तत्काल उपचार करें। रीडोमिल एमजेड का दो ग्राम प्रति लीटर घोल बनाकर प्रति बीघा फसल में छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा डाईथेनम 45 का छिड़काव कर फसल को रोगमुक्त किया जा सकता है। खेत के आसपास धुआं करने से भी पाले से फसलों को बचाया जा सकता है।
किसान बोले, बर्बाद हो जाएगी आलू व सरसों की फसल
मिहींपुरवा के पचासा गांव निवासी किसान रामसती व ओमप्रकाश कहते हैं कि मौसम के बदले मिजाज से गेहूं की फसल को आंशिक नुकसान है, लेकिन आलू व सरसों की फसल बर्बाद हो जाएगी। गुलालपुरवा गांव निवासी गुड्डू लोधी व राजेंद्र कुमार कहते हैं कि आलू की फसल पर झुलसा का प्रकोप दिखने लगा है। वैज्ञानिकों से सलाह लेकर कीटनाशकों का छिड़काव किया गया है। गेहूं की बोआई देर से की है। यदि मौसम का मिजाज अगले चार-पांच दिनों तक ऐसा ही रहा तो फसल नष्ट हो जाएगी। सरसों की पत्तियों पर चकत्ते पड़ने लगे है। वैज्ञानिकों से बात की तो पता चला कि यह झुलसा रोग है। कीटनाशक का छिड़काव कर फसल को नष्ट होने से बचाया जा रहा है। आलू की बर्बाद फसल के लिए किसान सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं।
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