दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन जैन अनुयायियों ने उत्तम आर्गव धर्म को अंगीकार कर मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की और जैन मंदिरों में आयोजित विधानों में भक्ति भाव से पूजा कर अर्घ्य समर्पित किए।
दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में युवा मंच द्वारा चल रहे तेरहद्वीप महामंडल विधान में भगवान चंद्रप्रभु का अभिषेक किया । पंडित नरेश चंद जैन शास्त्री के निर्देशन में संगीत की मधुर लहरियों के बीच नित्य-नियम की पूजा और दशलक्षण धर्म की पूजा की।
विधान में सुदर्शन मेरू के पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण क्षेत्र सहित सात पूजा की। इसमें ऋत्याकोन, जंबूवृक्ष, भरत क्षेत्र, रूपांचल, एरावत क्षेत्र आदि पूजा की। विधान के बीच-बीच में इंद्र-इंद्राणी ने नृत्य प्रस्तुत किए।
वहीं छोटा जैन मंदिर में प्रात: काल सामूहिक पूजा की और भगवान का अभिषेक किया। दिगंबर जैन अतिथि भवन में श्रद्धालुओं ने पीत वस्त्र धारण कर दशलक्षण धर्म की पूजा-अर्चना की।
महिलाओं और बच्चों ने भाग लिया। दिगंबर जैन अतिथि भवन में विहर्ष सागर महाराज ने तत्वार्थ सूत्र की वाचना की। सायंकाल बड़ा जैन मंदिर में जैन अतिथि भवन में भगवान की सामूहिक आरती उतारी और धार्मिक अंताक्षरी का कार्यक्रम हुआ। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इसमें सुनील, अतुल, संदीप जैन, अनिल, अमित, आलोक, प्रदीप, सुंदरलाल जैन, संयम, महीपाल, सतीश, राकेश जैन आदि रहे।
खेकड़ा। दस लक्षण पर्व के चलते नगर के भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर, शांति नाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में ब्रहमचारिणी कल्पना दीदी के सानिध्य में सुबह 7 बजे नित्य नियम पूजा अर्चना के साथ ही विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। इसमें कल्पना दीदी ने कहा कि सत्य अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही मानव कल्याण संभव है। जीवन धर्म के बिना व्यर्थ है। इस दौरान प्रवीन जैन, विरेंद्र जैन, अमित जैन, रीना जैन, नीतू जैन, बीना जैन समेत आदि रहे।
परमात्मा और मनुष्य के बीच की दूरी ही आर्जव धर्म है : विहर्ष सागर महाराज
बड़ौत। दिगंबर जैन अतिथि भवन में विहर्ष सागर महाराज ने कहा परमात्मा और मनुष्य के बीच की निकटतम दूरी का नाम ही आर्जव धर्म है। माया की बादलों के पीछे ही सत्यता सूर्य छिपा है। उसे प्रकट करने त्रियोग की चंचलता के बादलों को पूर्णतया से हटाना परम आवश्यक है।
माया का अर्थ है धोखा देना। उन्होंने कहा जीवन के साथ व अन्य लोगों के साथ प्रवचन करना मुख्य में राम बगल में छुरी की भावना से भरपूर होना। जिसका मन वचन व कषाय श्रेष्ठ कार्यों में एक नहीं होता उसके जीवन में धर्म का आगमन नहीं होता। है।
रिद्धि-सिद्धि विधान से पूजा की
बड़ौत। अजितनाथ दिगंबर जैन मंडी मंदिर में विहर्ष सागर महाराज के सानिध्य में रिद्धि-सिद्धि विधान का आयोजन किया और जैन श्रद्धालुओं द्वारा उत्तम आर्गव धर्म अंगीकार किया। पूजन का शुभारंभ शांतिनाथ भगवान के अभिषेक से हुआ। संगीतकार पराग एंड पार्टी द्वारा भजनों की प्रस्तुति हुई। इसमें इंद्राणियों ने नृत्य किए। शंातिधारा का सौभाग्य शुभम जैन को प्राप्त हुआ। कुबेर इंद्र विकास जैन को प्राप्त हुआ।
पंडित तरश चंद जैन शास्त्री ने विधि विधान से नित्य नियम पूजन रिद्धि-सिद्धि विधान की पूजा कराई। विधान के मध्य उन्होंने विधान की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। इसमें वरदान, अशोक, अनिल, मुकेश, संजय, त्रिस्ला, इंद्राणी, मधु जैन आदि रहे। रात्रि में जैन मिलन के सौजन्य से नेहरू बाल एकेडमी के बच्चों ने सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत किए। इसका शुभारंभ महावीर प्रार्थना से हुआ।
विद्यालय के बच्चों द्वारा हास्य नाटिका, धार्मिक भजनों पर नृत्य किया । धर्मसभा में सुरेंद्र, जितेंद्र, मंजू शर्मा, सीमा जैन, रश्मि पंवार, अभिलाषा, विधि, विराट, वंशिका, आंचल, कशिश, विदुषी, देवदंत, अवनी आदि रहे।