फ्रेंडशिप-डे पर विशेष
ऐसे दोस्तों की कहानी, जिन्होंने मुश्किल घड़ी में भी लोगों की मदद की
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। दोस्त है तो बेफिक्री है...दोस्त है तो मस्ती है। दोस्त है तो जन्नत है...दोस्त है तो हिम्मत है...। कोरोना जैसे कठिन समय में इन्हीं दोस्तों की वजह से हिम्मत बंधी रही। जब अपने साथ छोड़ रहे थे, पड़ोसी मुंह मोड़ रहे थे, तब भी दोस्त भरोसे की डोर को थामे रहे थे। उस वक्त भी, जबकि उन्हें पता था कि जिसका वह साथ देने जा रहे हैं, वह कोरोना संक्रमित है। मगर, दोस्ती में डर किसे...जान की परवाह किसे। शायद...इसी का नाम दोस्ती है। फ्रेंडशिप डे पर ऐसे ही दोस्तों की कहानी, जिन्होंने मुश्किल कड़ी में भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा और दूसरों की मदद की।
कोरोना संक्रमित दोस्त की बचाई जान
बिजरौल रोड निवासी विनीत मलिक व घनश्याम गंज मंडी निवासी सोनू बचपन के दोस्त है। कोरोना काल में जिस समय लोग एक-दूसरे का साथ छोड़ रहे थे, उस समय दोनों दोस्तों ने कोरोना संक्रमित कई लोगों की मदद की। दोनों के खड़खड़ी गांव निवासी दोस्त राहुल की रिपोर्ट कोरोना पाजिटिव आई। सांस लेने में भी परेशानी होने लगी। ऐसे में न तो आक्सीजन लेवल जांचने वाला था और न कोई दवा लाने वाला। ऐसे वक्त में दोनों दोस्तों ने अपनी जान हथेली पर रखकर न केवल राहुल का आक्सीजन लेवल चेक किया, बल्कि उसके लिए आक्सीजन सिलेंडर भी उपलब्ध कराया। इसके बाद भी हर रोज दवा और अन्य जरूरत सामान को पहुंचाया। दोस्तों की मेहनत का नतीजा रहा कि कुछ दिन वह पूरी तरह से स्वस्थ हो गया।
जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा देना प्राथमिकता
गुड्डू, धीरज व सचिन राठी तीनों दोस्तों की जोड़ी भी बेमिसाल है। इन तीनों दोस्तों की जोड़ी ने कोरोना काल में ऐसे जरूरतमंद बच्चों की मदद की, जिन्हें एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो रहा था। तीनों ने कोरोना काल में जान हथेली पर रखकर गरीब व जरूरतमंदों को खाद्य सामग्री वितरित की और जरूरतमंद बच्चों को पाठन सामग्री जैसे कापी, किताब, कलम आदि का वितरण किया। बताया कि समाज के जरूरतमंद बच्चों व उनके माता-पिता को अगर शिक्षा की अहमियत को सही तरह बताया जाए तो यह बच्चे अपने भविष्य उजागर कर सकते हैं
जरूरत पर रक्त दिया और समय के साथ गहरी हो गई दोस्ती
नगर की पट्टी चौधरान निवासी सविता राणा, अमृता, निधि, मीनाक्षी, रेनू व नरगिस की दोस्ती जरूरतमंदों को रक्त देने के साथ हुई। इसकी शुरुआत उस वक्त हुई, जब वर्ष 2012 में नगर की एक महिला दीपिका को डिलीवरी के दौरान खून की कमी हुई। दीपिका की डिलीवरी तो हो गई, लेकिन उसकी आंत में परेशानी थी, डॉक्टर ने ऑपरेशन की जरूरत बताई। बच्ची का बी-निगेटिव ग्रुप का ब्लड था। ब्लड बैंक और परिचितों से भी इस ग्रुप का रक्त नहीं मिल पाया। नवजात की लगातार हालत बिगड़ रही थी। सोशल मीडिया पर इन महिलाओं को जानकारी मिली, सभी अस्पताल में पहुंची और इन सहेलियों की टोली में से सविता ने रक्त दिया। बाद में पता चला कि ये सभी महिलाएं जरूरतमंदों की मदद करती है और जरूरतमंदों को रक्त भी देती है।
छह दशक पुरानी बाबा भोल्लर व हरफूल की दोस्ती
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दोघट। निरपुड़ा गांव के बाबा भोल्लर सिंह व हरफूल सिंह अमीन की जोड़ी को क्षेत्र ही नहीं आसपास के कई जिलों में जाना और पहचाना जाता है। 60 वर्षों से इन दोनों की दोस्ती बराबर चली आ रही है। सामाजिक राजनीतिक और अन्य कार्यक्रमों में दोनों को साथ देखकर लोग बड़े खुश होते हैं। आज भी जबकि यह दोनों 80 साल पार कर चुके हैं। किसी न किसी कार्यक्रम में मिलते हैं। ग्रामवासियों ने सामूहिक रूप से इस जोड़ी का कई बार सम्मान किया। ऐसे ही भड़ल के मास्टर राजपाल सिंह और दोघट के मास्टर रणसिंह पंवार की जोड़ी भी क्षेत्र वासियों के लिए एक उदाहरण थी। इन दोनों की भी पिछले 50 वर्षों से दोस्ती में चली आ रही थी। पिछले दिनों मास्टर रणसिंह पंवार का देहांत हो गया था। तभी से मास्टर राजपाल सिंह अपने आप को अकेला महसूस करने लगे हैं।