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वक्त ने दिव्यांग बनाया, हौंसले से बन गए सिकंदर

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वक्त ने दिव्यांग बनाया, हौसलों से छू लिया आसमान
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बागपत। बात-बात में हताशा से घिरने वाले युवाओं को जिले के दिव्यांग खिलाड़ियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। हौसला है तो सफलता कदम चूमती है। भागती दौड़ती जिंदगी में पीछे छूट जाने के डर को मात देकर दिव्यांग युवाओं के लिए रोशनी बन गए हैं। मैदान चाहे कोई भी हो, दिव्यांगों ने हौसले से मुसीबत के बादल छांट दिए। खेल के मैदान पर खेकड़ा के अंकुर धामा, बालैनी के आदित्य उपाध्याय समेत अन्य होनहारों ने ऐसा रंग जमाया कि हर कोई हैरान है।
दिव्यांगता को मात देकर आदित्य बना खिलाड़ी
बागपत। सैड़भर का आदित्य उपाध्याय के पिता राकेश उपाध्याय ड्राइवर हैं। वह चार भाइयों में सबसे बड़ा है। वर्ष 2014 में मेरठ से ग्रेजुएशन की परीक्षा देकर लौटते समय बालैनी पुल पर सड़क हादसे में रीढ़ की हड्डी में चोट लगने से उसके शरीर के नीचे के आधे हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। जिंदगी बोझ सी लगने लगी। लेकिन हौसला कम नहीं होने दिया। वर्ष 2017 में व्हीलचेयर लेकर फिर से नए जीवन की शुरूआत की। जेब खर्च के लिए ट्यूशन पढ़ाने का काम किया। व्हीलचेयर पर क्रिकेट सीखा। दिव्यांगों की यूपी टीम में उसका चयन हुआ। इसके अलावा मार्च 2019 में मेरठ में हुए यूपी स्टेट पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भाग लेकर शॉटपुट व भाला फेंक में गोल्ड मेडल जीत चुका है। अब 19 से 22 जुलाई तक पटना में होने वाली रग्बी नेशनल प्रतियोगिता की तैयारी में जुटा है।
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वक्त ने आंखें छीनी, अंकुर ने लिख दी नई कहानी
बागपत। पैरा एथलीट अंकुर धामा को अर्जुन अवार्ड मिल चुका है। इसके अलावा नेशनल पुरस्कार जीत चुके हैं। बचपन में होली के रंग आंखों में जाने से अंकुर की आंखों की रोशनी चली गई। खेकड़ा के इस दिलेर खिलाड़ी का बचपन अंधेरे में गुजरा। भाई गौरव धामा बताते हैं कि परिवार ने हौसला बढ़ाया और उसे कभी मायूस नहीं होने दिया। खेल की ललक लगी तो दिव्यांगों की दौड़ में अंकुर ने जलवा बिखेरना शुरू कर दिया। साल 2014 के एशियाई खेलों में दमदार खेलों का प्रदर्शन कर पदक जीते थे। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए कार्य करने वाले अंकुर को नेशनल पुरस्कार दिया। अंकुर कहते हैं कि अंधेरी जिंदगी में रोशनी भरने के संकल्प के साथ वह आगे बढ़ा, बस यही उसकी कामयाबी की किताब है। साल 2018 में पैरा एथलीट अंकुर धामा को अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया था।
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किक बॉक्सिंग का उस्ताद बन गया गौरी शंकर
बागपत। बड़ौत निवासी गौरी शंकर दिव्यांग है। वह बोल नहीं सकता। मोबाइल पर मैसेज के माध्यम से ही लोगों से बात करता है। कोच राज विपिन जोशिया ने बताया कि वर्ष 2008 में उसने राज बाक्सिंग क्लब बड़ौत से किक बॉक्सिंग सीखनी शुरू की थी। अब वह राष्ट्रीय स्तर पर धूम मचा चुका है। मूक बधिर होने के कारण वह आम बच्चों से अलग रहा। लेकिन कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश ने गौरी शंकर को आगे बढने का हौंसला दिया। खुद अपने खेल के साथ जांबाज खिलाड़ी युवा खिलाडिय़ों की पौध तैयार करने में जुटा है।
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