बड़ौत। लॉकडाउन पीरियड गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छी खबर लाया है। महामारी के दौरान के आंकड़ों पर गौर करें तो सिजेरियन प्रसव के बजाय नार्मल प्रसव पर ज्यादा जोर रहा है। बड़ौत सीचएसी के आंकड़े इसकी पुष्टि भी करते है। लॉकडाउन के तीन माह में जितने सिजेरियन प्रसव हुए है, उससे अधिक प्रसव को फरवरी माह में ही हो गए थे। खास बात यह है कि पूरे गर्भधारण के दौरान जिन मामलों में सिजेरियन आपरेशन के दावे किए गए थे, उनमें से अधिकांश प्रसव नार्मल ही हुए। चिकित्सकों की माने तो लॉकडाउन में परिजनों का मिला सहयोग भी इसका बड़ा कारण है। डॉ. शहजमानी का कहना है कि लॉकडाउन बाजार पूरी तरह से बंद थे। घर पर बना शुद्ध खाना ही अधिकांश गर्भवती महिलाओं को दिया गया। प्रदूषण न होने के कारण आबोहवा भी शुद्ध मिली। साथ ही लॉकडाउन के चलते परिवार के अधिकांश सदस्य घर पर रहे। इससे गर्भवती महिलाओं की देखरेख अधिक हुई और परिवार का माहौल खुशनुमा रहा। इस कारण गर्भवती महिलाएं तनावमुक्त रही। यह जच्चा और उसके शिशु के स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर रहा, क्योंकि अस्पताल से जल्द ही छुट्टी हो गई और कोरोना संक्रमण से भी बचाव हुआ।
सीएचसी से प्राप्त आंकडे़
माह नार्मल सिजेरियन
जनवरी 110 40
फरवरी 70 25
मार्च 90 30
अप्रैल 115 25
मई 130 15
जून(अब तक) 145 10
सीएचसी पर डिलीवरी अधिक बढ़ी
सीएचसी अधीक्षक डॉ. विजय कुमार ने बताया कि कोरोना महामारी के चलते सीएचसी पर डिलीवरी अधिक बढ़ी है। कहना है कि लॉकडाउन के तीन माह में जितने सिजेरियन प्रसव हुए है, उससे अधिक प्रसव को फरवरी माह में ही हो गए थे।
सिजेरियन प्रसव का खर्च 25 से 50 हजार
अमूमन नर्सिंग होम में सिजेरियन प्रसव के लिए 25 से 35 हजार रुपये तक तीमारदारों से लिए जाते हैं। अन्य गंभीर मरीजों के लिए जांच, आईसीयू आदि सुविधाओं के नाम पर यह रकम बढ़कर 50 हजार तक हो जाती है। दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में हर तरह की डिलीवरी पूर्णतया निशुल्क होती है। साथ ही जननी सुरक्षा योजना व मातृत्व वंदना योजना के तहत आर्थिक लाभ भी होता है।
सिजेरियन से बुढ़ापे तक दिक्कत
बड़ौत। डॉ. अजिका खान का कहना है कि सिजेरियन प्रसव से शरीर में कट होने से बुढ़ापे तक महिलाओं को दिक्कतें होती है। नार्मल प्रसव महिलाओं के लिए अच्छा साबित होता है। थोड़ा आराम के बाद ही महिलाएं कामकाज कर सकती है। शरीर पर भी कोई उल्टा प्रभाव नहीं पड़ता।