बड़ौत। शहर से लेकर देश तक की विरासत को भारतीय मुद्रा एवं डाक टिकट परिषद के प्रबंधक सचिन कुमार गुप्ता ने अपने पास सहेजा हुआ है। 16 वर्ष की आयु से ही वह अपने इस शौक के तहत हर वर्ष विभाग की ओर से प्रकाशित नए डाक टिकट को अपने पास सहेजने लगे। अपने सहेजे हुए डाक टिकट की वह कई बार स्कूलों और कालजों में प्रदर्शनी लगाकर लोगों को डाक टिकट की शुरुआत कैसे हुई और इसका क्या महत्व है, इसकी जानकारी देते रहे हैं।
नेहरू रोड निवासी सचिन कुमार गुप्ता ने बताया कि उन्हें शुरू से ही डाक टिकट संग्रह करने का शौक रहा, लेकिन वह अपने इस शौक को वर्ष 1994 से आयाम देने लगे। उनका कहना है कि अलग-अलग डाक टिकटों को वह अपनी लाइब्रेरी में सहेजने लगे। बताया कि कोई भी नया डाक टिकट जारी होता तो वह खरीदकर अपने घर की लाइब्रेरी में ले जाते। उनके पास डाक टिकट का इतना बड़ा संग्रह हो गया कि इसकी जानकारी जब विभागीय अधिकारियों को मिली तो उन्हें एक नई जिम्मेदारी दी गई। इस जिम्मेदारी के तहत वह स्कूल कालेजों में जाकर डाक टिकट बच्चों के बीच प्रस्तुत करते और उन्हें उनका महत्व बताते, किस तरह डाक टिकट में देश की विरासत और शहर की पहचान के साथ ही एक इतिहास भी छिपा रहता है।
एक लाख डाक टिकट का है संकलन
- सचिन गुप्ता के पास करीब एक लाख डाक टिकट हैं। उनके पास भारत के शिरोवस्त्र को पहचान दिलाने वाले डाक टिकट के साथ ही भारतीय सभी सुप्रसिद्ध संगीतकारों मसलन भीमसेन जोशी, गंगुबाई हंगल, अली अकबर खान, मल्लिकार्जुन मंसूर, विलायत खान, रवि शंकर जैसे विभूतियों पर प्रकाशित डाक टिकट हैं। देश की आजादी के चालीस वर्ष बाद डाक विभाग द्वारा तिरंगा डाक टिकट जिस पर हिंदी और उर्दू शब्द तिरंगा के रंगों में अंकित है, यह टिकट भी इनके कोष में हैं।