बिनौली। बरनावा के श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व माघ माह के उपलक्ष्य में चल रहे दशलक्षण पर्व के अष्टम सोपान पर श्रद्धालुओं ने उत्तम त्याग धर्म का अंगीकार किया। भगवान शांतिनाथ के समक्ष 120 श्रीफलों का त्याग किया।
पंडित प्रदीप पीयूष शास्त्री ने कहा कि धर्म की इमारत त्याग की नींव पर ही खड़ी होती है। त्याग का अर्थ है एक ऐसी अग्नि का संयोग, जो व्यर्थ का सब कुछ जलाकर राख कर दे। जगत में वहीं पुरुष दानी है, जो स्वेच्छा से अपने जीवन में त्याग को अपना लेता है। हर समय धन वैभव से धीरे-धीरे छूटने का प्रयास करते रहते हैं। ज्ञानी त्याग से नहीं विषय राग से डरता है। अज्ञानी त्याग से डरता है। उन्होंने कहा कि जिनके पास जीवन है, सौंदर्य है, यौवन है, किंतु त्याग नहीं है, वह संसार के सबसे बड़े भिखारी होते है। यदि वृक्ष फलों का त्याग करना बंद कर दे तो संसार की स्थिति क्या होगी। यदि नदी का जल बहना बंद हो जाए, वह एक ही स्थान पर इकट्ठा हो जाए तो उस पर काई जम जाएगी। पूजा अर्चना में राकेश जैन, लोकेश जैन, विशांत जैन, सरिता जैन, सीता जैन, राजेंद्र जैन आदि उपस्थित रहे।