मटिया महल में किताबे खरीदते अभिभावक व छात्र छात्राएं
सहारनपुर। सत्र शुरू होते ही कई स्कूलों का किताब विक्रेताओं के साथ मिलकर खेल शुरू हो गया है। स्कूलों ने पूर्व की तरह किताबों और यूनिफॉर्म के लिए दुकानें तय की हुई हैं। दिल्ली रोड पर कुछ दुकानें भी नजर आने लगी हैं, जो केवल सत्र की शुरुआत में एक महीना किताबें बेचकर निकल जाएंगे।
स्कूलों पर किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री में विक्रेता के साथ कमीशन तय होने के आरोप लगते रहे हैं। सवाल सभी स्कूलों की एक ही क्लास में अलग-अलग किताबें होने पर उठता है। आठवीं तक की कक्षाओं में कुछ किताबें तो सभी स्कूलों की एक ही रहती हैं, जैसे कक्षा तीन की भाषा माधुरी, नैतिक शिक्षा, माय इंग्लिश रीडर आदि, लेकिन इनके साथ चार से पांच किताबें स्कूल अपनी मर्जी से लगाते हैं। इसी में कमीशन का खेल शुरू होता है।
स्कूलों द्वारा अलग से लगाई जाने वाली किताबों के रेट में पब्लिशर से लेकर विक्रेता और स्कूल मिलकर लाभ कमाते हैं। सूत्र बताते हैं कि स्कूल पब्लिशर के साथ मिलकर कुछ किताबें तय करते हैं, जिनके रेट भी निर्धारित किए जाते हैं। पब्लिशर प्रिंट रेट पर 20 से 30 फीसदी की छूट के साथ किताबें उपलब्ध कराते हैं। इसके बाद स्कूल किसी एक विक्रेता को पकड़ते हैं, जो पब्लिशर से किताबें उठाकर बेचता है। जो 20 से 30 फीसदी की छूट पब्लिशर द्वारा दी जाती है उसमें विक्रेता और स्कूल का हिस्सा तय होता है।
स्कूलों का तर्क
स्कूल तर्क देते हैं कि एक स्थान से किताब या यूनिफॉर्म मिलने से अभिभावकों को ही सहूलियत होती है, क्योंकि उन्हें भटकना नहीं पड़ता है। इसके अलावा यूनिफॉर्म के कलर और कपड़े में भी एकरुपता रहती है।
सरकार को लेना चाहिए संज्ञान
संयुक्त अभिभावक संघ के जिलाध्यक्ष जयवीर सिंह राणा का कहना है कि शिक्षा मनुष्य की बुनियादी जरूरतों में से एक है। कुछ स्कूल अभिभावकों के उत्पीड़न के अड्डे बने हुए हैं। किताबों और यूनिफॉर्म तक में कमीशन तय रहता है। सरकार को जनहित में इन बातों का संज्ञान लेना चाहिए। पूरे देश में एक पाठ्यक्रम और एक रेट तय होने चाहिए।