दूसरा केस
बुढ़ेडा गांव के राजेन्द्र पुत्र कैप्टन महाराम सिंह का कहना है कि पहले लोग हंस-हंस कर बातें करते थे, आते-जाते हाल-चाल पूछते थे, लेकिन जैसे ही कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट आई, लोगों का व्यवहार ही बदल गया।
हालांकि गांव के गणमान्य लोगों व बुजुर्गाें ने लोगों को समझाया तो अब लोगों का बर्ताव कुछ ठीक-ठाक हुआ। राजेन्द्र का कहना है कि उन्होंने कोरोना पर विजय पा ली, लेकिन लोगों के व्यवहार ने उनके मनोबल को तोड़ दिया था। लेकिन अब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है।
तीसरा केस--
हिलवाडी गांव के सुऐब खान पुत्र यूनूस खान का है। गत माह 17 जून को कोरोना पॉजिटिव आने के बाद लोगों का हाव-भाव बदल गया था। मेरे परिवार को देखते ही पड़ोसी दरवाजा बंद कर लेते हैं।
मोहल्ले के लोग परेशान करते थे। जबकि पड़ोसी को शुभचिंतक होना चाहिए, लेकिन कई लोगों का व्यवहार खराब है। कुछ लोगों ने तो दूध वाले और सब्जी वाले को घर में समान देने से मना किया और उन लोगों से कहा कि सुऐब के घर समान देने से वायरस पकड़ लेगा।
क्या कहते है चिकित्सक
डाॅ. दिनेश बंसल का कहना है कि कोरोना किसी को भी हो सकता है, इसलिए किसी के साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। लेकिन कई लोग अछूतों जैसा व्यवहार करते है, जोकि गलत है। यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि ऐसी घटनाएं सामने आ रही है।
आम व्यक्ति इससे सुरक्षित रहने के बजाय डर में जीने लगा है। यदि क्वारंटाइन का बोर्ड किसी के घर में लग जाए, तो उसके प्रति पडोसियों का व्यवहार बदल जा रहा है। बीमारी से ग्रसित व्यक्तियों के साथ दोषियों की तरह व्यवहार किया जा रहा है। जब एक मरीज ठीक हो गया, तो उसके साथ और उसके परिवार के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार होना चाहिए।
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