बड़ौत। कोरोना संक्रमण से कराहती इंसानियत को इस वबा से निजात की दुआ के साथ रमजान के दूसरे अशरा में इबादतों का दौर तेज हो गया है। दूसरे अशरा को अशरा-ए-मगफिरत (अर्थात गुनाहों पर माफी का अशरा) कहा जाता है। रोजेदार अपने छोटे बड़े गुनाहों पर शर्मिंदगी के साथ अल्लाह के आगे हाथ फैलाकर मगफिरत की दुआएं भी मांग रहे हैं।
नगर के फूंसवाली मस्जिद के शाही इमाम आरिफ उल हक ने बताया कि रमजान में दो वक्त ऐसे हैं, इनमें अल्लाह रोजेदार की दुआ को जरूर सुनता है। एक इफ्तार के वक्त की दुआ और दूसरी नमाज-ए-तहज्जुद और सहरी के बीच की दुआ। रोजेदार के मुंह की महक अल्लाह को मुश्क और अंबर से भी ज्यादा पसंद है। उन्होंने कहा कि पहले दस दिन में अल्लाह अपने बंदों पर अपनी खास रमहत का नुजूल करता है। दूसरे अशरा में माफी के तलबगार बंदों को मगफिरत देता है। तीसरे और अंतिम अशरा में गुनाहों पर नादिम और माफी के तलबगार बंदों को जहन्नुम से आजादी का फरमान सुनाता है।
शाही इमाम ने बताया कि रमजान में गरीबों की खबरगीरी करने का हुक्म दिया। हमें अपने इफ्तार और सहरी के इंतजाम के साथ साथ गरीब पड़ोसी के इफ्तार और सहरी के इंतजाम के बारे में भी जानकारी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि रोजा रखने के साथ ही जकात और फितरा भी अदा करें। उहोंने फरमाया कि कसरत से कुरान की तिलावत भी करें। तिलावत - ए- कुरान से दिल का जंग दूर होता है।