बागपत। किसान आंदोलन के बीच हो रहे पंचायत चुनाव भाजपा जनप्रतिनिधियों के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। इनसे भाजपा शीर्ष नेतृत्व मतदाताओं का रुख भांपेगा तथा 2022 के विधानसभा चुनाव की रणनीति तय करेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन का इन चुनाव पर कितना असर पड़ेगा और स्थानीय जनप्रतिनिधि किस तरह विरोध को समर्थन में बदलेंगे यह देखना दिलचस्प होगा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति किसानों के इर्द-गिर्द घूमती है। किसानों का रुख जिस पार्टी की ओर होता है सत्ता की चाबी उसी के पास होती है। नए कृषि कानून बनने से किसान तबका भाजपा से नाराज है। इसके परिणामस्वरूप आंदोलनों और धरने की बाढ़ सी आ गई। विपक्षी दल भी आंदोलन में कूद पड़े। कई खाप किसानों के समर्थन में खड़ी हो गईं। इससे भाजपा नेतृत्व की बेचैनी बढ़ गई। पार्टी ने जनप्रतिनिधियों को किसानों के बीच जाकर कृषि कानूनों के फायदे समझाने और भाजपा के प्रति गुस्सा कम करने की जिम्मेदारी सौंपी है। जनप्रतिनिधियों को भी कई जगह किसानों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। अब पंचायत चुनाव में पार्टी ने जिला पंचायत सदस्य के सभी 20 पदों पर प्रत्याशी उतारे हैं। जिनकी जीत सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों को सौंपी है। पंचायत चुनाव का परिणाम आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी में अहम साबित होगा। इसमें संशय नहीं कि इन चुनाव में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने पर भाजपा थिंक टैंक को रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
सांसद और विधायक मैदान में उतरे
पंचायत चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित कराने के लिए पार्टी ने जनप्रतिनिधियों को निर्देश दिए हैं। इसके चलते पार्टी जनप्रतिनिधि मैदान में उतर चुके हैं। वे पार्टी प्रत्याशियों के लिए जनता के बीच जाकर वोट मांग रहे हैं।
वर्जन
पार्टी की ओर से पंचायत चुनाव के संबंध में निर्देश मिले हैं। इसके चलते प्रत्याशियों के कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं। नए कृषि कानूनों का असर पंचायत चुनाव में देखने को नहीं मिल रहा है। पार्टी के सभी प्रत्याशी जीत दर्ज कराएंगे।
-सहेंद्र सिंह रमाला, विधायक छपरौली।
पार्टी के निर्देश पर लगातार भाजपा के प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार कर रहा हूं। किसान आंदोलन का कहीं कोई असर देखने को नहीं मिला। चुनाव के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा प्रत्याशी ही होंगे।
- डॉ. सत्यपाल सिंह, सांसद बागपत।