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अब वो घड़ी हाथ नी आवे सखी री....

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अमीनगर सराय। दौर बदलने के साथ अब होली गीत भी नहीं गुनगुनाएं जाते। पहले फाल्गुन आते ही रात-रात भर होली के गीत गाए जाते थे। लोग गांव के मुख्य चौराहे पर इकट्ठा हो जाते थे। मिलकर होली के गीत गाते थे। होली से कई दिन पहले रागिनी होती थी, स्वांग होते थे, मगर अब न तो गांव में रागिनी होती है और न ही सांग। अब परंपरा छूट गई है।
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पूठड़ गांव के बुजुर्ग सौराज सिंह का कहना है कि पहले एक माह पूर्व ही गांवों में होली के गीतों का दौर चल पड़ता था। गांव के नुक्कड़ों पर लोगों की भीड़ लगी रहती थी। रागिनी और स्वांग के कार्यक्रम होते थे। लेकिन मनोरंजन के साधन बदलते ही अब यह चीजें बीते दौरे की बातें हो गई है।
यहीं के बुजुर्ग धर्मवीर सिंह फाल्गुन का जिक्र छिड़ते ही होली गीत ‘लोग नर देखे जाए तमाशे, फागुन आया रे, जा मरने से बच गई उका मेरा हाथ, घोड़ा केस मांगे नार दीवानी’ जैसे लोकगीत गाए जाते थे। गांव में गीतों का दौर चल पड़ता था। गीतों से ही पता चलता था कि होली आ गई हैं।
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जगपाल यादव कहते है कि होली पर गांव के चौराहों पर कार्यक्रम होते थे। लोग उत्साह के साथ इन कार्यक्रमों में भाग लेते थे। अब इन होली गीतों की गूंज सुनाई नहीं पड़ती।
शिवकुमार शर्मा का कहना है कि ‘वही को भाग जहां से तू आई, उसी संग ब्याही, सब मुल्कों में उड़ी हवाई’ जैसे गीतों पर लोग नाचते थे और खुशियां मनाते थे। मगर अब इन गीतों का जमाना नहीं रहा है।
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