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अब वो घड़ी हाथ नी आवे सखी ...

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वक्त के साथ बीते जमाने की बात हुए होली गीत
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फोटो : 5 की सीरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
अमीनगर सराय। बदलते दौर में अब होली गीत नहीं गुनगुनाएं जाते। पहले फाल्गुन आते ही रात-रात भर होली के गीत गाए जाते थे। लोग गांव के मुख्य चौराहे पर इकट्ठा होकर होली के गीत गाते थे। होली से कई दिन पहले रागिनी होती थी, स्वांग होते थे, मगर अब यह परंपरा बीते जमाने की बात हो गई है।
कस्बा अमीनगर सराय के सुशील शर्मा बताते है किपहले होली से एक माह पूर्व गांवों में होली के गीतों का दौर चल पड़ता था। नुक्कड़ों पर लोगों की भीड़ लगी रहती थी। गांवों में रागिनी और स्वांग के कार्यक्रम होते थे। मगर, अब मनोरंजन के साधन के साथ दौर भी बदल गया है। पिलाना के बाबूराम फाल्गुन का जिक्र छिड़ते ही बताते है कि ‘लोग नर देखे जाए तमाशे, फागुन आया रे’ जैसे लोकगीत गाए जाते थे। कस्बा अमीनगर सराय की विद्यावती कहती है कि होली पर गांव के चौराहों पर कार्यक्रम होते थे। अब इन होली गीतों की गूंज सुनाई नहीं पड़ती। अब इन गीतों का जमाना नही रहा है।
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होली पर चौपाई निकालने की परंपरा भी हो रही लुप्त
बड़ौत। होली के त्योहार पर गांव गांव, शहर शहर निकलने वाली चौपाइयां भी लुप्त हो गई हैं। चौपाइयों में जहां मनोरंजन था, वहीं होली आ रही है इसका संदेश भी दिया जाता है। बड़ौत निवासी प्रीतम सिंह वर्मा बताते है कि रामचन्द्र की वन यात्रा पर चौपाईयां गाई जाती थी। ‘वन को चले दो भाई री माई, इन्हें समझावों न कोई, आगे-आगे राम चलत है, पीछे से लक्ष्मण भाई री माई, इन्हें समझावों न कोई’। इन चौपाइयों से त्योहार पर सौहार्द बनाए रखने की अपीलें भी की जाती थीं।
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परिवार के बीच सिमटा होली का त्योहार
डॉ. ओमवीर सिंह तोमर बताते हैं कि होली के दिन लोग पुराने विवादों व मनमुटाव को भुलाकर आपस में गले मिलते थे। लेकिन जैसे-जैसे हालात बदले तो होली का पर्व एक सीमित दायरे में सिमट गया। आज लोग अपने परिजनों के बीच ही त्योहार मनाना बेहतर समझते हैं। जिंदगी में बिताए समय को देखें तो होली की वो रंगों की मस्ती मानों लुप्त ही होती चली गई। लोगों की सोच बदल गई है, होली खेलना पानी की बर्बादी समझा जाने लगा है।
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