बरनावा में एतिहासिक स्थल
- फोटो : Amar Ujala
उसके बाद एएसआई के तत्कालीन प्रोफेसर देवीलाल की देखरेख में उत्खनन शुरू हुआ। जहां से चित्रित धूसर मृदभांड मिले, जिनकी कार्बन डेटिंग से मृदभांड के पांच हजार वर्ष पुराने होने की जानकारी मिली। जिनके महाभारतकालीन होने का दावा भी किया गया और रिपोर्ट एएसआई को भेज दी गई थी।
वर्ष 2018 में एएसआई ने बड़े स्तर पर टीले पर उत्खनन किया था। यहां से महाभारतकालीन अवशेष और बड़ी ईंटों की दीवारें भी मिल चुकी हैं। जिसके बाद संरक्षित कर दिया गया था।
बरनावा का एतिहासिक टीला
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ब्रह्मऋषि कृष्णदत महाराज ने की गुरुकुल की स्थापना
महाभारत कालीन ऐतिहासिक लाक्षागृह टीले पर पूर्व जन्म के श्रंगी ऋषि कृष्णदत्त महाराज ने वर्ष 1966 में गुरुकुल की स्थापना की थी। अब यहां पर श्री महानंद संस्कृत विद्यालय चलता है।
प्रधानाचार्य आचार्य अरविंद कुमार शास्त्री ने बताया कि इस समय विद्यालय में यूपी, हरियाणा, छतीसगढ़, दिल्ली आदि विभिन्न प्रांतों से करीब 200 बच्चे संस्कृत के साथ वेदों और शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि विद्यालय में पांच यज्ञ शालाएं हैं। जिन पर वर्ष भर में श्रावणी पर्व व गुरुकुल संस्थापक ब्रह्मऋषि कृष्णदत्त महाराज के जन्मोत्सव पर सामवेद पारायण महायज्ञ तथा फाल्गुन मास में आठ दिवसीय चतुर्वेद पारायण महायज्ञ होता है।
अमर उजाला में प्रकाशित खबर । संवाद