अपने परिवार के साथ लच्छीराम...
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पुरानी पेंशन योजना का फायदा कोई ढिकौली गांव के पूर्व सूबेदार 90 साल के लच्छीराम से पूछिए... इन्होंने सेना में 35 रुपये प्रतिमाह वेतन से नौकरी शुरू करके 24 साल देश सेवा की। लच्छीराम पिछले 48 साल से पेंशन ले रहे हैं और अब उनको 55 हजार रुपये पेंशन मिल रही है।
यूं तो ढिकौली गांव की पहचान सैनिकों से है। यहीं के लच्छीराम को पिता चौ. बिशंभर की तरह देश की सेना की वर्दी पहनने का जुनून था। लच्छीराम कक्षा नौ उत्तीर्ण करने के बाद सीधे मेरठ छावनी पहुंचकर वर्ष 1953 में पंजाब रेजिमेंट में सिपाही भर्ती हो गए।
पहला वेतन मिला 35 रुपये, जो उस समय काफी मायने रखता था। कुछ साल बाद पंजाब रेजिमेंट से जाट रेजिमेंट में भेज दिए गए। वह बताते हैं कि 1962 में चीन से और 1965 व 1971 में पाकिस्तान से जंग लड़ी। वर्ष 1977 में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त होने पर 95 रुपये पेंशन मिली, मगर अब हर माह 55 हजार रुपये मिल रही है।
अब परिवार की चौथी पीढ़ी भी सेना में
पूर्व सूबेदार लच्छीराम के पिता चौ. बिशंभर सिंह भी सेना में रहे। भारत की ओर से 1942 के द्वितीय विश्व युद्ध में सिंगापुर में लड़े और वहां पकड़े जाने पर जेल में भी रहे। सिंगापुर से छूटने के बाद पुलिस में भर्ती हुए। वर्तमान में लच्छीराम के दो बेटे रामबीर और राजकुमार सेना में हवलदार हैं। इन दोनों सैनिकों के बेटे भी सुनील व दीपक सेना में रहकर देश सेवा कर रहे हैं।