बड़ौत। आचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि जो बन्ध न कर रहे हैं, वे वन्दना कर रहे हैं। समझ में आ रहा है क्या? वन्दना करो, बन्ध न करो। बन्ध न करो, वन्दना करो। परमेष्ठी के पादमूल में आकर भी बन्ध करके चला जाता है और ज्ञानी घर में बैठकर भी वन्दना कर लेता है। घर में बैठकर भी कर्म की निर्जरा कर लेता है।
जैनमुनि ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मोक्ष तेरे हाथ में है, संसार तेरे हाथ में है। भगवान के हाथ में न तो मेरा मोक्ष है, न मेरा बन्ध है। कण-कण स्वतंत्र है। निज के भावों में ही बन्ध है और निज के भावों में ही मोक्ष है। भगवान स्वतंत्र हैं, उनकी सत्ता स्वतंत्र है। सम्पूर्ण पदार्थों की सत्ता स्वतंत्र है। भगवान बंध नहीं कराते, भगवान मोक्ष नहीं दिलाते, परन्तु भगवान की अवहेलना यदि करेगा तो निश्चित ही बन्ध होगा और भगवान की वन्दना करेगा तो मोक्ष मिलेगा। सारे विश्व में वस्तु स्वतंत्रता की व्याख्या करने वाला यदि कोई है तो उसका नाम वीतराग जिनशासन है। वर्द्धमान को नमस्कार हो। कौन-से वर्द्धमान को? जो श्री से वर्द्धमान हों, चारित्र से वर्द्धमान हों और जो श्री की वर्द्धमानता को छोड़कर चारित्र में वर्द्धमान हुए हैं, वो तीर्थंकर भगवान महावीर हैं। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में प्रवीण जैन, विनोद जैन, अतुल जैन, वकील चंद जैन, सुनील जैन, अनुराग मोहन, राकेश जैन, आलोक मित्तल, अमित जैन शामिल रहे।