बागपत। कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स के पदक विजेताओं के साथ ही ओलंपियन देने वाले बागपत में खेल सुविधाओं का बुरा हाल है। यहां करोड़ों रुपये से बनवाए गए स्टेडियमों की बुरी हालत है, तो कोच भी नहीं है। ऐसे में खिलाड़ी कैसे तैयार होंगे। इस तरह के हालात होने के बावजूद भी अधिकारी खेल सुविधाओं को बेहतर करने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
बागपत की खेल के क्षेत्र में अलग पहचान रही है और यहां के खिलाड़ियों ने विदेशों तक देश का झंडा लहराया है। यहां छह अर्जुन अवार्डी हैं तो लक्ष्मण, रानी लक्ष्मीबाई और यश भारती अवार्डी खिलाड़ी भी हैं। इसके बावजूद यहां खेल सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है। करोड़ों खर्च कर बनाए गए स्टेडियम रखरखाव अभाव में बदहाल हो चुके हैं।
खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए कोच भी नहीं है। हालात यह है कि खिलाड़ियों को सुविधाओं के अभाव में प्रैक्टिस करने के लिए दूसरे जिले और राज्यों में जाना पड़ता है। जिला स्तर पर केवल एक एथलेटिक्स कोच है जो कागजों में खेकड़ा स्टेडियम में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रहा है। भारोत्तोलन कोच की जिम्मेदारी जिला क्रीड़ा अधिकारी संभाल रही हैं और वह केवल कार्यालय में रहती हैं।
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इन खेलों के नहीं कोच
जिले में कुश्ती, कबड्डी, शूटिंग, क्रिकेट, बैडमिंटन, तैराकी, वॉलीबाल, बाक्सिंग के कोच नहीं है। फिलहाल एक कोच की नियुक्ति हुई है, क्षेत्रीय कार्यालय से स्वीकृति न मिलने के कारण कोच की तैनाती अभी तक नहीं हो सकी है।
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जिले में छह अर्जुन अवार्डी
बागपत के गांवों में खिलाड़ी तैयार होकर जिले का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर चुके हैं। यहां अब तक छह खिलाड़ियों को अर्जुन अवार्ड मिल चुका है। पहला अर्जुन अवार्ड 1987 में मलकपुर के पहलवान सुभाष तोमर को मिला था। 12 साल बाद जौहड़ी के पिस्टल शूटर विवेक सिंह को 1999 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2003 में मलकपुर के पहलवान शोकेंद्र तोमर को अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2010 में मलकपुर के फ्री स्टाइल पहलवान राजीव तोमर को अर्जुन अवार्ड मिला। दाहा गांव के पहलवान सुनील राणा को वर्ष 2014 में अर्जुन अवार्ड मिला तो पैरा एथलीट अंकुर धामा को भी सरकार ने अर्जुन अवार्ड दिया।
सरकार को देना चाहिए ध्यान
ओलंपियन राजीव तोमर का कहना है कि स्टेडियम की हालत जब तक नहीं सुधरेगी, तब तक खिलाड़ी कैसे तैयार होंगे। यहां करोड़ों रुपये से स्टेडियम बना था, लेकिन उसकी हालत खराब हो चुकी है। कोच भी नहीं होने से बुरे हालात हैं। अर्जुन अवार्डी पहलवान शोकेंद्र तोमर का कहना है कि शासन-प्रशासन खेल प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए प्रयास नहीं कर रहा है। कोच व रख-रखाव के अभाव में बड़ौत और खेकड़ा का स्टेडियम बदहाल हो गया है। खिलाड़ियों को दूसरे जिलों और राज्यों में प्रैक्टिस करनी पड़ रही है। क्रिकेटर और अंडर-19 खेल चुकीं शशि माथुर का कहना है कि जिले में कोच और मैदान की कमी है। कोच और अच्छे मैदान न होने के कारण वह बाहर प्रैक्टिस कर रही हैं।
कोट...
कोरोना काल के बाद जिले को एक मात्र एथलेटिक्स का कोच मिला है। एक अन्य कोच की फिलहाल नियुक्ति हुई है, मगर अभी तक क्षेत्रीय कार्यालय से दिशा-निर्देश न मिलने के कारण कोच को जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। स्टेडियम की हालत सुधारने के लिए प्रयास किए जा रहे है। - सरिता रानी, जिला क्रीड़ा अधिकारी