पिछले कुछ समय से होलिका दहन स्थलों का विस्तार हुआ है। खासकर शहरों में। जहां परंपरा के नाम पर हर बार हरियाली से खिलवाड़ करते हुए सैकड़ों पेड़ों का दहन कर दिया जाता है। इतना ही नहीं कार्बन का उत्सर्जन कम होने से मानव जीवन भी प्रभावित होगा। जहां पर पहले से ही प्रदूषण लोगों के लिए एक चुनौती बना हुआ है।
वन क्षेत्राधिकारी राजपाल सिंह और वन रक्षक सुनील शर्मा के अनुसार एक विकसित पेड़ मानव जीवन को अपने पूरे कार्यकाल में करीब 15.60 लाख रुपये कीमत की सेवाएं देता है। इसमें मानव शरीर से निकलने वाली कार्बन के उत्सर्जन से लेकर दूसरी तमाम चीजें प्राप्त होती है।
एक यूकेलिप्टस के पेड़ को तैयार होने में 8 से 10 वर्ष और नीम, शीशम आदि के पेड़ को तैयार होने में 20 से 25 वर्ष का वक्त लगता है। इतना ही नहीं एक सामान्य पेड़ की लकड़ी करीबन तीन होलिका जल जाती है। यानी एक पेड़ जिसके रोपण से तैयार होने तक लोगों के वर्ष गुजर जाते हैं।
गली-गली लगती है होलिका
बड़ौत। एक वक्त था जब गांवों मेें एक स्थान पर होली लगने की परंपरा थी। जहां होलिका दहन के समय पूरे गांव के लोग एकत्र होते थे और पूरे वर्षभर जुटाई गई लकड़ी को होलिका में लगते थे। उसी का होली में दहन करते थे।
लोग एक साथ मिल कर होलिका दहन करते थे। इससे परंपरा के साथ ही भाईचारा बढ़ता था। गांवों में तो नहीं शहरों में यह परंपरा अब तार-तार हो गई है। अब शहर की गली-गली होलिका लगाई जाने लगी है। इस वजह से लकडि़यों की मात्रा भी काफी अधिक लगती है। लोगों को सोचना होगा कि पर्यावरण को सुरक्षित बचाने के लिए अभी से विचार करने की जरूरत है।