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विधानसभा चुनाव 2022: नौ विधायक 84 साल में नहीं बनवा पाए पुल, खतरे हजार, जुगाड़ से ग्रामीण करते हैं नदी पार

Tue, 18 Jan 2022 04:51 PM IST
Dimple Sirohi मुकेश पंवार, अमर उजाला, बागपत

सार

हादसे को न्योता देने वाला यह रास्ता कई लोगों के लिए काल बन चुका है। ग्रामीण रामपाल व बृजपाल सिंह का कहना है कि चुनाव आते ही नेताओं को गांव की याद आने लगती है। चुनाव जीतने के बाद नेता ग्रामीणों व उनकी समस्याओं को भूल जाते हैं।
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बल्ली के पुल से गुजरती महिला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बागपत के बड़ौत तहसील मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर स्थित रहतना गांव से गुजर रही कृष्णा नदी को रोजाना किसान, मजदूर, महिला व स्कूली बच्चे खतरा उठाकर पार करते हैं। 84 साल से लकड़ी का पुल ही एकमात्र साधन है। यह गांव छपरौली विधान सभा क्षेत्र में आता है। यहां के लोगों ने आजादी के बाद से नौ विधायक चुने लेकिन उन्हें पुल नसीब नहीं हुआ, जबकि यहां के किसानों की नदी के दोनों ओर लगभग 800 बीघा जमीन है। 

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करते हैं मौत का सामना
रहतना गांव के आधे से अधिक किसानों का रकबा कृष्णा नदी के दूसरी तरफ है। खेतों पर जाने के लिए एक पुलिया तीन किमी दूर बरनावा और दूसरी करीब ढाई किमी दूर रंछाड़ में है। फेर से बचने के लिए किसानों ने गांव के सामने ही नदी पर बल्लियां गाड़कर रास्ता बनाया हुआ है। ऐसे में रहतना समेत आधा दर्जन से अधिक गांवों के किसानों को खेत में जाने के लिए या तो नदी पर बने लकड़ी के पुल से होकर गुजरना पड़ता है या फिर 10 किमी का सफर तय करना पड़ता है।

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बहन-भाई समेत कई लोग गवां चुके हैं जान
हादसे को न्योता देने वाला यह रास्ता कई लोगों के लिए काल बन चुका है। करीब छह साल पहले बल्लियों के सहारे नदी पार कर रही स्कूली छात्रा मनीषा और उसका भाई हादसे का शिकार हो गए थे। दोनों की नदी में गिरकर मौत हो गई थी। वहीं, अन्य छात्र चोटिल हुए। इनके अतिरिक्त नदी में गिरकर विजय कश्यप, सत्यवीर, पल्लेराम, कालू समेत अन्य कई लोगों की जान जा चुकी है।

वहीं, प्रकाश, वीर सिंह, प्रवेश, कालू, दीपक, संजीव आदि समेत कई घायल हुए और कई ऐसे हैं जो स्थायी रूप से विकलांग हो चुके हैं। गांव में महज प्राथमिक विद्यालय है। ऐसे में छात्रों को कक्षा पांच के बाद की पढ़ाई करने के लिए लकड़ी के पुल से कृष्णा को पार करके रंछाड़, सिरसली व बिनौली जाना  पड़ता है।

ये बोले ग्रामीण
ग्रामीण रामपाल व बृजपाल सिंह का कहना है कि चुनाव आते ही नेताओं को गांव की याद आने लगती है। चुनाव जीतने के बाद नेता ग्रामीणों व उनकी समस्याओं को भूल जाते हैं। इससे अब लोगों में आक्रोश पनपता जा रहा है। प्रदीप तोमर व भरत सिंह का कहना है कि इस बार ग्रामीण उसी नेता को वोट देंगे, जो उनकी समस्याओं का समाधान करेगा। 

वर्ष                        विधायक
1937-1977       चौधरी चरण सिंह
1977                नरेंद्र सिंह
1980                सरोज देवी
1988                नरेंद्र सिंह
1989                नरेंद्र सिंह
1991                प्रो. महक सिंह
1993                नरेंद्र सिंह
1998                गजेंद्र मुन्ना
2000                अजय कुमार
2007                डॉ. अजय तोमर
2012                वीरपाल राठी
2017               सहेंद्र सिंह रमाला
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