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एक हज और उमरों के बराबर होता है एतकाफ का सवाब

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अग्रवाल मंडी टटीरी। मुबारक रमजान माह के 20 रोजों के बाद एतकाफ का समय शुरू हो जाता है। रमजान माह में हर मुसलमान का रोजा रखना फर्ज है। हाफिज अय्यूब ने कहा कि एक सुन्नत ऐसी भी है, जिसे गांव या बस्ती में एक आदमी भी अदा कर दे तो पूरी बस्ती को सवाब मिलता है। अगर एक आदमी भी अदा न करें तो उसका गुनाह पूरी बस्ती पर होता है।
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रमजान के आखिरी आशरे में 10 दिन का एतकाफ होता है। एतकाफ का मतलब शबे कद्र की तलाश में तन्हाई में बैठकर इबादत करना है। एतकाफ का समय 20वें रोजे का सूरज डूबने से पहले शुरू होता है और ईद का चांद दिखाई देने के बाद खत्म होता है। एतकाफ ऐसी जगह होती है, जहां पांच वक्त की नमाज जमात के साथ होती है। एतकाफ में बैठा व्यक्ति रात-दिन मस्जिद में ही रहकर इबादत करता है। उसका खाना-पीना सब मस्जिद में ही होता है। एतकाफ में बैठने का सवाब दो हज और दो उमरों के बराबर बताया जाता है। जो इंसान अल्लाह को खुश करने के लिए एक दिन का एतकाफ करता है। जहन्नुम जाते वक्त जमीन और आसमान के बीच की दूरी से 3 गुना दूर हो जाती है। एतकाफ का मतलब शबे कद्र की तलाश है। एतकाफ में बैठा व्यक्ति फिजूल वार्ता से दूर रहकर बेशुमार सवाब का हकदार बन जाता है। इसलिए एतकाफ में बैठना सुन्नत है। इससे पूरी बस्ती के गुनाह अल्लाह माफ फरमा देते हैं।
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