बागपत। रालोद मुखिया अजित सिंह को 30 साल की राजनीति में मिली सबसे बड़ी हार के लिए अभी तक कोई भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सका है। रालोद के नेता वोट कम मिलने के लिए अपनी कमियों पर परदा डालकर दूसरों पर उंगली उठाने में लगे हैं। कोई भी यह नहीं बता रहा है कि सबसे मजबूत संगठन और सबसे ज्यादा नेता होने का दावा करने वाले दल के मुखिया को शिकस्त क्यों मिल गई।
यह बात सही है कि चुनाव पर मुजफ्फरनगर दंगे का असर पड़ा, जिससे जाट-मुस्लिम समीकरण बिगड़ गया। गलत यह भी नहीं है कि मोदी लहर में दलित और अति पिछड़े ही नहीं, जाट युवा भी बह गए। इसके बावजूद अजित सिंह की हार इसलिए चौंका रही है क्योंकि रालोद मुखिया सिर्फ हारे ही नहीं, बल्कि तीसरे नंबर पर पहुंच गए। दूसरा छपरौली में भी पीछे रह गए।
यह हाल तब हुआ जबकि इस बार एक तो जाट आरक्षण दिलाया गया, दूसरा यह पहला मौका था जब अजित सिंह ने किसी चुनाव में न केवल खुद इतनी सारी रैलियां की, बल्कि जयंत और चारू ने रोड शो भी किए।
इसका मतलब तो यही है कि कहीं न कहीं रालोद संगठन की पकड़ कमजोर रही। बागपत वह जिला है जहां रालोद के सबसे ज्यादा पूर्व विधायक और सबसे ज्यादा प्रदेश स्तरीय नेता हैं। पूर्व विधायकों में कोकब हमीद, महक सिंह, अजय कुमार, डॉ. अजय तोमर और नरेन्द्र सिंह शामिल हैं जबकि प्रदेश और मंडल के संगठन में महिपाल नैन, धनपाल गुर्जर, सुरेश चंद कौशिक, लेखराज प्रदान, प्रीतम सिंह, धीरज उज्ज्वल, सुखवीर गठीना, रमेश त्यागी, आनन्द खिन्नर को संगठन में बड़े पद मिले हुए हैं।
जिला पंचायत के चेयरमैन योगेश धामा भी रालोद के ही हैं। जिला संगठन की कमान अनिल जैन के पास है। युवा रालोद की भी बड़ी टीम है। नेताओं की इतनी बड़ी फौज होने के बावजूद अजित सिंह का किला इतनी आसानी से ढह गया, लेकिन अब कोई हार की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। एक दूसरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं।
तो मैं संन्यास ले लूंगा : अनिल
रालोद जिलाध्यक्ष अनिल जैन ने शनिवार को पार्टी कार्यालय पर प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि शुक्रवार की मीटिंग में न तो कोई मारपीट हुई, न ही उन्होंने अजित सिंह पर कोई टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अगर कोई यह साबित कर दे कि उन्होंने अजित सिंह के बारे में कुछ कहा या मीटिंग में मारपीट हुई, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे।