बागपत। ककौर गांव के जंगल में तेंदुआ की मौत के बाद अब वन विभाग और पशु चिकित्सा विभाग आमने सामने आ गए हैं। डीएफओ का कहना है कि रेस्क्यू टीम के पहुंचने से पहले ही स्थानीय पशु चिकित्सक ने दवाई को इंजेक्ट कर दिया था। जबकि पशु चिकित्साधिकारी का कहना है कि लिखित में रेंजर ने बेहोशी का इंजेक्शन लगाने के लिए कहा था। प्रकरण की जांच शुरू हो गई है। लखनऊ के अधिकारियों ने बागपत में डेरा डाल लिया है। पूरे प्रकरण की हाई लेवल कमेटी ने जांच शुरू कर दी है।
तेंदुआ की मौत की गूंज लखनऊ तक पहुंची। मुख्य वन संरक्षक वन्य जीव लखनऊ के प्रतिनिधि वन संरक्षक वन अपराध अन्वेषण ब्यूरो एचवी गिरीश मौके पर पहुंचे। बड़ौत रेंज में भी मामले की जानकारी ली। डीएफओ अनिल कुमार मिश्र ने प्रेस बयान जारी कर कहा कि खटके में तेंदुआ के फंसे होने की सूचना पर रेस्क्यू टीम को मौके पर भेजा, लेकिन टीम के पहुंचने से पहले ही स्थानीय पशु चिकित्सक ने तेंदुआ को दवाई इंजेक्ट कर दी। जब टीम पहुंची वह अचेत अवस्था मेें था। पिंजरे में डालने के पश्चात पशु चिकित्सक ने रिवाइव के लिए भी दवाई दी, लेकिन रिवाइव के कुछ समय बाद ही तेंदुआ की मौत हो गई। वन विभाग के रवैये पर मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ राजपाल सिंह का कहना है कि वन रेंजर ने लिखित में विभाग को सूचना देकर तेंदुआ को बेहोश करने के लिए कहा था। इसकी लिखित सूचना विभाग के पास है। इंजेक्शन से मौत नहीं हुई है।
पहले स्थानीय स्तर पर कराया जाना था पोस्टमार्टम
बागपत। तेंदुआ की मौत के बाद स्थानीय स्तर पर पोस्टमार्टम की तैयारी थी। लेकिन एकाएक लखनऊ के आदेश पर बरेली के आईवीआरआई सेंटर से टीम भेजने और मामले की जांच के निर्देश हुए, जिसके बाद प्रक्रिया बदली गई।
ग्रामीण बोले, हमले बचाया और सिस्टम ने मार दिया
बागपत। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने तेंदुआ को शिकारियों से बचाया। वन विभाग की टीम, पुलिस और रेस्क्यू टीम पहुंचने तक तेंदुआ जिंदा था। ग्रामीणों ने वन विभाग की मदद की है। जो ग्रामीणों को कहा गया, वहीं किया गया। ओवरडोज, वन विभाग की लापरवाही जांच होनी चाहिए।
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