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कांवड़ के साथ बेटी बचाओ का संदेश दें रही शकीना

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बागपत। बेटियों को दुनिया में आने से पहले ही मौत दें दी जाती है, लेकिन हरियाणा की शकीना अपनी तीन बेटियों को लड़कों से ज्यादा मानते हुए उनके साथ हर वर्ष कांवड़ लेने हरिद्वार जाती है। हर किसी को संदेश देती है बेटी बचेगी तो समाज बचेगा। इनके बिना अच्छे समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। उसके घर में तीन बेटियां हैं, लेकिन परिवार बहुत खुश है। उनकी किलकारियों से आंगन में खुशियां आती है।
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हवस के भूखे भेड़िए कब किस बेटी को अपना शिकार बना लें कुछ कहा नहीं जा सकता है। यह ही डर बेटियों समाज से दूर करता जा रहा है। इसी वजह से लिंगानुपात निरंतर गिर रहा है, लेकिन हरियाणा के गांव रठार की रहने वाली शकीना ने न सिर्फ इस डर का डट कर मुकाबला किया और तीन बेटियों को जन्म दिया। शनिवार की दोपहर जब हरिद्वार से कांवड़ लेकर शकीना अपने मां ब्रह्मो और भतीजे की बहु अंग्रेजों के साथ गौरीपुर गांव पहुंची। शकीना से कांवड़ लाने का मकसद पूछा तो उसने कहा वह समाज को बेटियों के प्रति संदेश देना चाहती है। बेटियों को बोझ न समझे। यह तो दो घरों में रोशन करती है। इसके माध्यम से अच्छे समाज की आस की जा सकती है। यदि बेटियां नहीं रहेगी तो किसी का भी परिवार आगे नहीं बढ़ सकेगा। भगवान ने उसको तीन बेटियां दी हैं, इसमें सबसे बड़ी बेटी महिमा, उससे छोटी मानसी और सबसे छोटी नैना है। इनका वह अच्छी तरह से पालन पोषण कर रही है। वह छठी बार कांवड़ ला रही है। हर यात्रा पर अपनी बेटियों का साथ लेकर जाती है। जब भी कोई उनसे पूछता है तो वह उसको यह ही जवाब दिया जाता है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।

मां बह्मो की है 20वीं कांवड़
शकीना की मां ब्रहमो ने बताया कि उसकी उम्र 75 साल के लगभग हो गई है। यह उसकी 20वीं कांवड़ है। वह भी अपने बेटी के साथ कांवड़ लाई है। बेटी उसके साथ कंधे से कंधा मिलकर चलती है तो गर्व महसूस होता है। इसी पद चिन्ह पर उसकी बेटी शकीना चल रही है। वह भी अपनी तीनों बेटियों के साथ कांवड़ ला रही है। हम केवल भगवान से सुख, समृद्ध और बच्चों की लंबी आयु की कामनाएं करते हैं।
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रेहड़े में तीनों बेटियों के आराम की कर रखी है व्यवस्था
महिमा, मानसी और नैना को कोई परेशानी न हो, इसके लिए रेहड़े में सभी व्यवस्था शकीना ने कर रखी है। बेटियों के आराम की सभी व्यवस्था है। धूप से बचने के लिए पॉलिथीन की छत बनाई है। इसी बारिश से भी बचाव रहता है। वह रेहड़े को लेकर पैदल निरंतर मंजिल की बढ़ रही है।
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