बदल गए चुनाव, अब बात-बात में तनाव
बड़ौत (बागपत)। निकाय चुनाव के मतदान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। गली-मोहल्लों से लेकर बसों और ट्रेनों में चुनाव की चर्चा है। कौन किसे समर्थन दे रहा है और किसका दावा कितना मजबूत है। किसके एजेंडे में कितना दम है, किस प्रत्याशी का क्या इतिहास है। राजनीतिक दलों की चाल क्या है और नतीजों से लोकसभा चुनाव पर क्या असर पड़ने वाला है। तमाम बातें और तमाम चर्चाएं चल रही है। बुजुर्ग मतदाताओं का कहना है कि चुनाव का मैदान पूरी तरह बदल चुका है।
सेवानिवृत्त इंजीनियर इकबाल सिंह कहते है कि पहले के चुनाव और अब के चुनाव में दिन-रात का अंतर दिख है। पहले अच्छे विचार वाले प्रत्याशी को वोट दी जाती थी, अब रुपयों के बल पर प्रत्याशी वोटरों को ही खरीद लेते है। जबकि पहले कोई भी वोटर किसी भी कीमत पर बिकाऊ नहीं था।
वेदू सिंह कहते है पहले चुनाव प्रचार शांतिपूर्ण ढंग से या पैदल डोर-डोर किया जाता था, अब चुनाव खर्चीला हो गया है। चुनाव प्रचार में कई-कई वाहनों का इस्तेमाल किया जाता है। कई प्रत्याशी ऐसे हैं जो आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन खामोश है।
ऋषिपाल तोमर का कहना है कि अब चुनाव सिर्फ जाति और धर्म का रह गया है। शराब और रुपयों की ताकत पर आसानी से अधिकतर प्रत्याशी वोट खरीद लेते है। आम जनता को अपनी जिम्मेदारी को समझना ही होगा। जब तक जनता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगी, स्थिति नहीं सुधरेगी।
विनोद बालियान का कहना है कि पहले चुनाव में कोई गड़बड़ी नहीं होती थी, लेकिन अब फर्जी मतदान होने से माहौल खराब होने लगा है। फर्जी मतदान के सहारे कई प्रत्याशी हारा हुए चुनाव भी आसानी से जीत लेते है।
बुजुर्ग सनसपाल कहते है पहले चुनाव बैलगाडी या पैदल ही जनसंपर्क होता था। विभिन्न समाज के लोग सामाजिक मुद्दों पर समर्थन करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। निकाय चुनाव में अब रुपये और शराब का चलन बढ़ गया है।