बागपत। बरनावा में लाक्षा गृह बताए जाने वाले टीले के क्षेत्र की जमीन को लेकर 47 साल बाद भी कोई फैसला नहीं हो सका है। सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम में सोमवार को अधिवक्ताओं की हड़ताल के चलते सुनवाई नहीं हो सकी। मंगलवार का फिर से सुनवाई होनी है।
बरनावा में खसरा संख्या 3377, जिसका रकबा करीब 36 बीघा हैं। बरनावा में लाक्षा गृह क्षेत्र की इस जमीन को कब्रिस्तान की बताते हुए वर्ष 1970 में अदालती लड़ाई शुरू हुई थी। वादी खालिद खां के अधिवक्ता शाहिद अली ने बताया कि सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम की अदालत में यह प्रकरण चल रहा है। सोमवार को सुनवाई होनी थी, लेकिन हड़ताल के चलते अगली सुनवाई के लिए मंगलवार को दिन निर्धारित किया । वर्ष 2005 से पहले यह प्रकरण मेरठ के सरधना की अदालत में चल रहा था, लेकिन बागपत में कोर्ट बन जाने के बाद इसकी सुनवाई यहीं पर शुरू हो गई है। प्रकरण में वादी पक्ष की गवाही हो चुकी है, अब दूसरे पक्ष की गवाही होनी है। कई बार जमीन को लेकर तनाव बन चुका है।
क्या है मामला
बरनावा में लाक्षागृह बताने वाले क्षेत्र में जमीन का विवाद है। वक्फ कब्रिस्तान टीला बताते हुए खालिद खां कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि टीले पर गुंबद स्थित है वह वर्ष 1370 में दिल्ली से आए बदरुद्दीन शाह की मजार है। अदालत में कहा गया कि वर्ष 1966 में यहां पर गांधी जी की मूर्ति रखवा दी गई थी। इसके बाद से यहां पर निर्माण कार्य किए। वादी पक्ष का दावा है कि अवैध कब्जा किया गया है।
टीले पर चल रहा संस्कृत महाविद्यालय
बागपत। बरनावा टीले पर गांधी धाम समिति की ओर से एक संस्कृत महाविद्यालय संचालित है। गाजियाबाद के थाना मुरादनगर के गांव खुर्रमपुर सलेमाबाद से बरनावा आकर कृष्णदत्त महाराज ने क्षेत्र में शिक्षा का प्रचार किया और यहां पर संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। पांच हजार से अधिक यज्ञ कराए। वैदिक संस्कृति, भारतीय संस्कृति, राष्ट्रवाद की भावना का प्रचार किया। महाविद्यालय में उनकी मूर्ति भी लगाई गई है। संस्था में प्रधानाचार्य विनोद कुमार आर्य कहते हैं कि विद्यालय क्षेत्र की पहचान है। इस क्षेत्र की जमीन संस्कृत महाविद्यालय की है, इस पर अगर कोई दावा करता है तो वह गलत है।