बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि विष पीकर भी अगर कोई जीना चाहे तो उसका कोई औचित्य नहीं। विष पीने वाला मर जाता है। जीने की तमन्ना करने वाला विष कभी नहीं पीता।
वे जैन स्थानक शहर में आचार्य आनंद महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि विष पीकर जीने की तमन्ना करना व्यर्थ होता है। इसी प्रकार पाप कर्म में निर्लिप्त व्यक्ति कोई सुख पाना चाहता है तो वह भी व्यर्थ ही है। उसे पाप के स्वरूप को समझना होगा तभी इससे बचा जा सकता है। जिसे पाप और पुण्य की जानकारी ही नहीं है वह पाप को कैसे छोड़ सकता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में 18 प्रकार के पाप होते हैं। पाप तो पाप ही होते है वह कहीं भी छिपकर क्यों न किया जाए। उसका फल तो भोगना ही पड़ता है। जब व्यक्ति पाप कर्म करता है तब वह ध्यान नहीं देता कि वह क्या कर रहा है मगर जब इसका फल भोगता है तब कहता है मैंने तो ऐसा कर्म किया ही नहीं। उन्होंने बताया कि नर्क में दुख का ग्राफ अधिक होता है सुख का ग्राफ कम होता है। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी विचार रखे। धर्मसभा में जयप्रकाश जैन, सुखबीर सिंह, सुधीर जैन, बिजेंद्र जैन, हंस कुमार, संजय जैन, मनोज जैन, गौरव जैन, भोपाल जैन, शैलबाला, संतोष, उर्मिला, ललिता आदि उपस्थित रहे।