अग्रवाल मंडी टटीरी (बागपत)। रमजान मुबारक माह को अल्लाह ने अपना महीना कहा और ईद भी इसी की देन है। सारी खुशियों को समेटकर अल्लाह की बारगाह में जाने और सजदा करने का नाम ईद है।
मौलाना वकील अहमद और याकूब ने अकीदतमंदों से फरमाया कि जिस दिन ईद होती है, उस दिन सारे जहां की खुशियों को समेटकर अल्लाह बंदे की झोली में डाल देता है। रसूल-ए-खुदा फरमाते हैं कि जब रमजान मुबारक की आखिरी रात होती है तो आसमानों के फरिश्ते रोते हैं। यहां तक की जमीन और आसमान भी रमजान मुबारक माह निकलने पर आंसू बहाते हैं, इसलिए इस रात को बहुत ही अफजल कहा गया है। रमजान में आखिरी अशरे में कुरान नाजिल हुआ जो पूरी दुनिया के लिए रहमत और सलामत का पैगाम लेकर आया। रमजान का माह मौका देता है कि अल्लाह की रात में चले और कोई भी काम ऐसा ना करें जो अल्लाह को नागवार लगता हो। ईद की खुशी में दूसरों को भी शरीक करने को कहा गया है। ईद की नमाज को जाए और पड़ोस में रहने वाला व्यक्ति भूखा रहे, यह सही नहीं है। इस लिए पड़ोसी को भी ईद की खुशी में शामिल करें। सदका-ए-ईद इसी का नाम है। उलेमा ने मुस्लिमों से रोजे रखने, नमाज पढ़ने और अपने गुनाह की माफी की दुआ मांगने का आह्वान किया।