तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में राजनीति भी काफी बदल गई। जिस सीट पर किसी जमाने में कांग्रेस का दबदबा होता था, वहां चार दशक से सूखा है। पार्टी एक जीत को तरस रही। 1984 के चुनाव में आखिरी बार लालगंज संसदीय सीट पर कांग्रेस को जीत मिली थी। उसके बाद से उसके हाथ खाली हैं।
मालूम हो कि 1952 में हुए पहले आम चुनाव में लालगंज सीट से दो सांसद चुने गए। सभी पार्टियों ने दो-दो प्रत्याशी मैदान में उतारे। जिसमें कांग्रेस के विश्वनाथ और सीताराम को जीत मिली। इसके बाद 1962 के चुनाव में एक बार फिर विश्राम प्रसाद ने इस सीट पर कांग्रेस का झंडा बुलंद किया।
1967 में कांग्रेस पार्टी के रामधन ने जीत हासिल की। 1977 के चुनाव में रामधन ने पाला बदला और बीएलडी के टिकट पर मैदान में उतरे। उन्होंने कांग्रेस के लालसा को हराकर जीत हासिल की। 1980 के लोकसभा चुनाव में जेएनपी एस के टिकट पर मैदान में उतरे छांगुर को जीत मिली। उन्होंने जेएनपी के रामधन को हराया।
1984 में रामधन ने पाला बदला और कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इस चुनाव के बाद कांग्रेस फिर से इस सीट पर कभी नहीं जीती। 1989 में रामधन ने पार्टी बदली और जनता दल के टिकट पर मैदान में उतरे और जीते। 1991 में भी उन्होंने इस सीट पर जनता दल के टिकट पर जीत हासिल की।
दूसरे स्थान पर यहां बीजेपी के श्यामधारी रहे। 1996 में सपा-बसपा के उदय के बाद बसपा के डॉ. बलिराम ने सपा के दरोगा प्रसाद सरोज को हराकर जीत हासिल की। 1998 में सपा के दरोगा प्रसाद सरोज ने बसपा के डॉ. बलिराम को हराया। 1999 में फिर बसपा के डॉ. बलिराम ने सपा के दरोगा प्रसाद सरोज को हराया।
2004 के चुनाव में सपा के दरोगा प्रसाद सरोज ने बसपा के डॉ. बलिराम को हराकर इस सीट पर कब्जा जमाया। 2009 में बसपा के डॉ. बलिराम ने भाजपा की नीलम सोनकर को हराकर जीत हासिल की। लेकिन 2014 के चुनाव में नीलम ने सपा के बेचई सरोज को हराकर इस सीट पर जीत हासिल की। 2019 के चुनाव में बसपा की संगीता आजाद ने भाजपा की नीलम सोनकर को हराकर इस सीट पर कब्जा जमाया।