सठियांव चीनी मिल में रखी चीनी की बोरियों को ले जाते मजदूर।
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सठियांव। राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी दक्षता में परचम फहराने वाली चीनी मिल सठियांव में पिछले दो महीने से चीनी का कोटा लैप्स हो रहा है। विपक्ष इसे प्रबंधन तंत्र पर लापरवाही का आरोप लगा रहा है। वहीं मिल वाले कोरोना महामारी में चीनी की खपत कम होने की बात कर रहे हैं।
जानकारी मुताबिक सठियांव मिल को बीते सत्रों में बेहतर परफॉरमेंस के लिए प्रधान प्रबंधक बीके अबरोल को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया गया था। वर्तमान समय में हाल यह है कि चीनी है लेकिन ग्राहक नहीं है। हालांकि मिल में चीनी बिक्री का कोटा मिल संघ से तय किया जाता है। अक्टूबर माह में निर्धारित 41 हजार क्विंटल के सापेक्ष मात्र 13 हजार क्विंटल की बिक्री हुई तो कोटा निरस्त कर दिया गया। इसके पहले सितंबर माह में 36 हजार क्विंटल के सापेक्ष 19362 क्विंटल चीनी का उठान हुआ। कम सप्लाई होने से इस बार भी कोटा लैप्स हो गया। पूर्व उप सभापति किसान प्रतिनिधि आनंद उपाध्याय ने आरोप लगाया कि प्रबंधन तंत्र की लापरवाही के चलते लगातार कोटा निरस्त हो रहा है। जिसका खामियाजा मिल को ब्याज के रूप में भरना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि गोदाम सहित चीनी बैंक के पास बंधक है। डायरेक्टर राम अवध यादव ने कहा कि सठियांव मिल की चीनी, क्वालिटी में अन्य मिलों से खराब है। इसी कारण चीनी की बिक्री कम हो रही है। प्रधान प्रबंधक प्रताप नारायण ने बताया कि क्वालिटी के लिए कार्यदायी संस्था इसकी जिम्मेदार है। मामला जो भी हो लेकिन इससे मिल पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ बढ़ रहा है।