फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रंग महोत्सव की आखिरी शाम रही पहलवान की ढ़ोलक के नाम

विज्ञापन
शारदा टाकीज में चल रहे आरंगम में प्रस्तुत नाटक पहलवान की ढोलक का दृश्य। - फोटो : AZAMGARH
विज्ञापन
आजमगढ़। सूत्रधार आजमगढ़ द्वारा तीन मार्च से नगर के शारदा टाकिज परिसर में आयोजित 16वें आजमगढ़ रंग महोत्सव में शुक्रवार को आखिरी शाम पहलवान की ढ़ोलक के नाम रही। सूत्रधार रंगमंडल की यह प्रस्तुति फणीश्वर नाथ रेणु कृत पहलवान की ढोलक का सफल मंचन ममता पंडित के निर्देशन में किया गया। जिसमें कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से सभी का मन मोह लिया।
विज्ञापन

यह कहानी एक पहलवान की है जिसे कुश्ती लड़ने का बहुत शौक है। वह और उसके दो बेटे दिन-रात अखाड़े में रहा करते हैं। वहां के राजा ने उन्हें मदद दे रखी है। वे रोज पौस्टिक भोजन करते हैं और जमकर व्यायाम करते हैं। जिससे पहलवान के नाम की धूम मची हुई है। अचानक एक दिन राजा जी का देहांत हो जाता है उनके उत्तराधिकारी पुत्र की नजर में अखाड़े बाजी और दंगल सब फालतू की गतिविधियां हैं। पहलवान व उनके बेटे को मिलने वाले राज्याश्रय को राजा के उत्तराधिकारी बंद कर देते हैं। पहलवान को जीवन में पहली बार जीवन के यथार्थ का एहसास होता है। वह अपने दो पुत्रों के साथ दंगल का स्कूल खोल देता है। जहां वह गांव गिरावं के बच्चों को कुश्ती के दांव सिखाता है लेकिन धीरे-धीरे बच्चों की रुचि कुश्ती में नहीं रह जाती। अंत में वह बस अपने दो बेटों को ही सीखा रहा होता है। फिर गांव में हैजा फैल जाता है और एक एक कर गांव में रोजाना मौतें शुरू हो जाती है। धीरे-धीरे पूरा गांव हैजे के प्रकोप से घिर जाता है। पहलवान के दोनों बेटे भी काल के शिकार होते हैं। लेकिन इस अत्यंत दुख की घड़ी में भी पहलवान अपने प्रिय ढ़ोलक बजाने की आदत को नहीं छोड़ता वह पूरी रात ढ़ोलक बजाता रहता है। सुबह होने पर ढ़ोलक की आवाज नहीं सुनाई देती पता चलता है सियारों ने उसकी जांघ और पेट के साथ ढोलक की चाम को भी काट डाला है। कहानी आज के परिवेश में पूरी तरह से प्रासंगिक है। बदलते हुए मूल्य और संस्कार, जीवन के रहन-सहन ने कलाओं व खेलकूद के प्रति रुझान को कम किया है। जिसका असर पहलवान व उसके बेटों पर पड़ना लाजमी है। अपने रचनात्मक प्रायोगिक निर्देशन से ममता ने एक उम्मीद जगाई। 40 मिनट की प्रस्तुति में पुनीत यादव, सूरज यादव और सत्यम पांडेय ने मुख्य भूमिका निभाई है। इसका प्रकाश किया है भारतेंदु नाट्य अकेडमी से स्नातक हरकेश मौर्य व संगीत रितेश रंजन ने दिया। इस मौके पर डा. अतुल गुप्ता, डा. नितेश यादव, डा. खुशबू सिंह, डा. सीके त्यागी, डा. दीपक पांडेय, प्रिया पांडेय, प्रियंका पांडेय, कंचन मौर्या, अरुण मौर्य आदि उपस्थित थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें