आजमगढ़। जनपद को ऐसे ही सपा का गढ़ नहीं कहा जाता है यह बात विधानसभा में भी साबित हो गई। भले ही भाजपा ने प्रदेश में सरकार बना ली लेकिन जनपद की दसों विधानसभा सीटों पर सपा ने कब्जा जमा लिया। कुछ ऐसा ही हाल लोकसभा में रहा है। मोदी लहर में आजमगढ़ संसदीय सीट पर सपा का ही कब्जा रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की प्रचंड लहर पूरे देश में चल रही थी तब सपा मुखिया रहे मुलायम सिंह यादव यहां से चुनाव लड़ने आए। भाजपा ने उनके खिलाफ रमाकांत यादव को मैदान में उतारा। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने भाजपा प्रत्याशी को पछाड़ते हुए जीत हासिल की। इसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव हुए तो मुलायम सिंह यादव के उत्तराधिकारी और सपा मुखिया अखिलेश यादव इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरे। जनपद की जनता ने एक बार फिर मोदी लहर के विपरीत सपा का साथ दिया और अखिलेश यादव ने भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ को पराजित करते हुए जीत हासिल करने में कामयाबी हासिल की। लेकिन विधानसभा चुनाव में करहल सीट से चुनाव जीतने के बाद अखिलेश यादव ने विधानसभा में रहना कबूल करते हुए आजमगढ़ संसदीय सीट को छोड़ दिया।
उनके सीट छोड़ने के बाद रिक्त सीट पर उपचुनाव के लिए दुंदुभी बज चुकी है। वहीं इस चुनाव में सपा प्रत्याशी को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। लोगों द्वारा इस सीट पर मुलायम परिवार से ही किसी के मैदान में उतरने में संभावना जताई जा रही है। लेकिन जनपद में कई बार आ चुके अखिलेश यादव इस सवाल पर चुप्पी साध गए और पार्टी नेताओं से बात कर इसका फैसला करने की बात कही। अब सबकी नजरें उनके फैसले पर टिकी हुई है। वहीं भाजपा की बात करें तो पिछले लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के हाथों हार का सामना करने वाले दिनेश लाल यादव निरहुआ एक बार फिर मैदान में उतरने की फिराक में हैं। अब पार्टी किसे मैदान में उतारती है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
70 के दशक तक कांग्रेस का थी गढ़
70 के दशक तक आजमगढ़ सीट कांग्रेस की रही। यहां लंबे समय तक (1952 से 1971) तक कांग्रेस का राज रहा, लेकिन 70 के दशक में एक बार जो यह सीट पार्टी से फिसली तो फिर कांग्रेस कभी वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई। पर 1984 में जरूर कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट पर कब्जा किया लेकिन उसके बाद से अब तक यह सीट कांग्रेस के हाथ नहीं लगी है। हालांकि 2009 में एक बार इस सीट पर बीजेपी भी कमल खिलाने में सफल हुई है। वहीं 1952 के बाद अब तक के इतिहास को देखें तो बीएसपी भी चार बार यह सीट कब्जा करने में सफल रही है।
मुस्लिम या यादव की होती है जीत
वर्ष 1996 से आजमगढ़ में सिर्फ मुस्लिम और यादव उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। रमाकांत यादव ने यहां साल 1996 और 1999 में एसपी प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की थी। वह साल 2004 में बीएसपी और 2009 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते थे। साल 1998 और 2008 में इस सीट पर हुए उपचुनावों में बीएसपी के अकबर अहमद डंपी ने फतह हासिल की थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने बीजेपी उम्मीदवार रमाकांत यादव को करीब 63 हजार मतों से हराया था। इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 19 लाख मतदाताओं में से साढ़े तीन लाख से अधिक यादव, तीन लाख से ज्यादा मुसलमान और करीब तीन लाख दलित हैं।